मध्य प्रदेश स्थित महान सांची स्तूप का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में कराया था। दुनिया के सबसे प्राचीन बौद्ध स्मारकों में शामिल सांची स्तूप के अंदर भगवान गौतम बुद्ध के पवित्र अवशेष हैं। इसके सुंदर तोरण द्वार और नक्काशी आज भी यात्रियों और शोधकर्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
तमिलनाडु के महाबलीपुरम में मौजूद 8वीं शताब्दी का यह मंदिर यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट है। पल्लव शासक नरसिंहवर्मन द्वितीय ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था और यह समुद्र तट पर बने सबसे शुरुआती संरचनात्मक मंदिरों में शामिल है। तराशे हुए पत्थरों से बना यह मंदिर द्रविड़ शैली का अनूठा उदाहरण है।
महाराष्ट्र के एलोरा गुफा समूह में मौजूद कैलासा मंदिर इंजीनियरिंग और कला का अद्भुत नमूना है। 8वीं शताब्दी में बना यह मंदिर एक ही विशाल चट्टान को काटकर ऊपर से नीचे की ओर बनाया गया था। इस संरचना का निर्माण लगभग 2 लाख टन चट्टान को हटाकर किया गया जो आज भी एक रहस्य है।
चंदेल वंश के राजाओं ने 950 से 1050 ईस्वी के बीच खजुराहो के मंदिर बनवाए, जो अपनी उत्कृष्ट मूर्तिकला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। यहां की मूर्तियां देवताओं, नर्तकियों व जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं और आध्यात्मिक व भौतिक संसार के संतुलन को भी दर्शाती हैं।
बिहार में मौजूद बाराबर गुफाएं भारत की सबसे प्राचीन रॉक-कट गुफाओं में शामिल हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व अशोक काल में बनी ये गुफाएं अजिविका संप्रदाय ने अपने उपयोग के लिए बनाई थीं। इनकी चमकदार दीवारें और सरल डिजाइन शुरुआती पत्थरकारी कला की श्रेष्ठता को दर्शाती हैं।
चोल सम्राट राजराजा प्रथम ने 1010 ईस्वी में तमिलनाडु का भव्य बृहदेश्वर मंदिर बनवाया था। पूरी तरह ग्रेनाइट से बने इस मंदिर का 200 फीट ऊंचा विमान और 80 टन का शीर्ष भाग वास्तुकला का अभूतपूर्व नमूना है। यहां मौजूद विशाल नंदी प्रतिमा भी मंदिर का मुख्य आकर्षण है।
भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर को 11वीं शताब्दी में बनाया गया था और यहां पर शिव की उपासना होती है। लगभग 180 फीट ऊंचा शिखर और परिसर में मौजूद अनेक छोटे मंदिर इसे पवित्रता के साथ वास्तुकला का भी उत्कृष्ट केंद्र बनाते हैं।
भगवान सूर्य देव को समर्पित 1250 ईस्वी में निर्मित यह मंदिर अद्भुत कलाकृति है। 24 विशाल पत्थर के पहियों और सात घोड़ों के साथ यह मंदिर समय की गति को दर्शाने वाला अपने आप में अनूठा स्थापत्य है। यह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट दुनियाभर में प्रसिद्ध है।
7वीं शताब्दी में बना इस मंदिर में आज भी पूजा होती है। इसकी ऊंची गोपुरम, स्तंभयुक्त मंडप और बारीक नक्काशी विजयनगर साम्राज्य की समृद्धि का प्रमाण आज भी देता है।