'ठाकुर जी' की नगरी में नए साल के स्वागत को श्रद्धा के रंग में रंगा वृंदावन, बांके बिहारी के दर्शन को उमड़ा आस्था का सैलाब

नए साल की शुरुआत अपने आराध्य के दर्शन के साथ करने की इच्छा लिए हजारों लोग वृंदावन पहुंचे हैं। बांके बिहारी मंदिर के बार लोगों का सैलाब देखे को मिल रहा है। ठाकुर बांके बिहारी की नगरी इन दिनों श्रद्धा, प्रेम और आस्था के रंगों में सराबोर है।

Authored by: वर्षा कुशवाहाUpdated Dec 29 2025, 16:12 IST
आस्था का सैलाब और ठाकुर जी की नगरी01 / 08

आस्था का सैलाब और ठाकुर जी की नगरी

​वृंदावन की गलियां नए साल के स्वागत में श्रद्धा के रंग में रंगी हुई हैं, जहां लाखों भक्त अपने आराध्य की एक झलक पाने को उतावले दिख दे रहे हैं।​

भक्तिमय वातावरण में नए साल की दस्तक02 / 08

भक्तिमय वातावरण में नए साल की दस्तक

​बांके बिहारी के आंगन में उत्सव का माहौल है, यहां कैलेंडर बदलने के साथ ही प्रभु के प्रति अटूट विश्वास का एक नया अध्याय शुरू होता दिखाई दे रहा है।​

दर्शन के लिए उमड़ा भक्तों का जलूस03 / 08

दर्शन के लिए उमड़ा भक्तों का जलूस

​सुबह की मंगला आरती से ही बांके बिहारी मंदिरों के बाहर लंबी कतारें लगी हैं। हर श्रद्धालु अपने साल की शुरुआत प्रभु के चरणों से करना चाहता है।​

गोद में बाल-गोपाल लिए पहुंचे भक्त04 / 08

गोद में बाल-गोपाल लिए पहुंचे भक्त

​अनगिनत भक्त अपने साथ लड्डू गोपाल को लेकर वृंदावन पहुंचे हैं। यहां भक्ति और वात्सल्य के एक अद्भुत दृश्य देखने को मिल रहा है।​

मंगल कामनाओं से आंखें हुई नम05 / 08

मंगल कामनाओं से आंखें हुई नम

​मंदिर के द्वार पर खड़े श्रद्धालु भावुक नजर आ रहे हैं। मंदिर के द्वार पर खड़े होकर वह अपने ठाकुर जी से सुख-समृद्धि और मंगल भविष्य की प्रार्थना कर रहे हैं।​

सनातन की ओर लौटता आधुनिक समाज06 / 08

सनातन की ओर लौटता आधुनिक समाज

भक्तों का मानना है कि आज का युवा पीढ़ी दिखावे को छोड़कर शांति की तलाश में फिर से अपनी जड़ों और अध्यात्म की ओर रुख कर रही है। दुनिया के शोर-शराबे से दूर वृंदावन पहुंचे लोगों के अनुसार, आत्मिक शांति केवल श्री कृष्ण की शरण में ही प्राप्त हो सकती है।​

संस्कार और संस्कृति का अद्भुत संगम07 / 08

संस्कार और संस्कृति का अद्भुत संगम

​वृंदावन में नए साल का यह उत्सव संदेश दे रहा है कि असली खुशी आतिशबाजी में नहीं, बल्कि भक्ति और संस्कारों के संरक्षण में ही निहित है।​

अमर है कृष्ण भक्ति की यह परंपरा08 / 08

अमर है कृष्ण भक्ति की यह परंपरा

​साल बदलते रहते हैं लेकिन ब्रज की यह पावन परंपरा सदियों से इसी तरह जीवंत और ऊर्जावान बनी हुई है। चारों ओर "राधे-राधे" की गूंज और श्रद्धालुओं के खिले हुए चेहरे नए साल की एक सकारात्मक और सात्विक शुरुआत का प्रतीक हैं।​​

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