क्या लोग सच में जाम से दूरी बना रहे हैं? शेयर बाजार का हाल तो यही इशारा कर रहा है। भारत-EU ट्रेड डील की खबरों और बदलती लाइफस्टाइल के बीच United Spirits और Sula जैसे दिग्गज शेयरों में भारी गिरावट आई है। आइए जानते हैं, क्या यह शराब के शौकीनों की कमी है या बाजार का कोई नया खेल।
पिछले कुछ दिनों में भारतीय शेयर बाजार में शराब बनाने वाली प्रमुख कंपनियों, जैसे 'सुला वाइनयार्ड्स' (Sula Vineyards), 'रेडिको खेतान' (Radico Khaitan) और 'युनाइटेड स्पिरिट्स' (United Spirits) के शेयरों में 4 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। निवेशकों के बीच इस बात को लेकर डर है कि आने वाले समय में इन घरेलू कंपनियों का मुनाफा कम हो सकता है।
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाली 'फ्री ट्रेड डील' है। इस समझौते के तहत दोनों पक्ष एक-दूसरे के सामान पर आयात शुल्क (Import Duty) कम करने पर सहमत हो सकते हैं। यूरोपीय संघ लंबे समय से भारत से शराब, विशेषकर वाइन और स्कॉच व्हिस्की पर लगने वाले भारी टैक्स को कम करने की मांग कर रहा है।
वर्तमान में भारत विदेशी शराब पर लगभग 150% तक का भारी आयात शुल्क वसूलता है। अगर इस ट्रेड डील के बाद यह टैक्स घटकर 50% या उससे कम हो जाता है, तो विदेशी वाइन और व्हिस्की भारतीय बाजार में काफी सस्ती हो जाएंगी। इससे आम ग्राहकों के लिए लग्जरी विदेशी ब्रांड्स खरीदना आसान हो जाएगा।
जब विदेशी प्रीमियम शराब सस्ती होगी, तो भारतीय कंपनियों के महंगे ब्रांड्स को कड़ी टक्कर मिलेगी। लोग थोड़े से अतिरिक्त पैसे देकर भारतीय वाइन के बजाय विदेशी वाइन चुनना पसंद कर सकते हैं। यही वजह है कि शेयर बाजार में इन कंपनियों के भविष्य के मुनाफे को लेकर चिंता जताई जा रही है।
हालांकि हेडलाइन में यह सवाल पूछा गया है, लेकिन असलियत यह है कि खपत कम नहीं हुई है, बल्कि 'पसंद' बदल रही है। नई पीढ़ी (Gen-Z) अब 'मात्रा' के बजाय 'क्वालिटी' पर ध्यान दे रही है। वे कम लेकिन अच्छी और प्रीमियम शराब पीना पसंद करते हैं। अगर विदेशी ब्रांड सस्ते मिलते हैं, तो भारतीय कंपनियों का मार्केट शेयर गिर सकता है।
जैसे ही ट्रेड डील की खबरें तेज हुईं, बड़े निवेशकों ने शराब कंपनियों के स्टॉक्स से अपना पैसा निकालना (Profit Booking) शुरू कर दिया। उन्हें डर है कि अगर सरकार ने विदेशी कंपनियों को ज्यादा रियायत दी, तो भारतीय कंपनियों की सेल और मार्जिन दोनों पर बुरा असर पड़ेगा।
भारतीय शराब कंपनियां पिछले कुछ सालों से खुद को 'प्रीमियम' सेगमेंट में स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन यूरोपीय देशों (जैसे फ्रांस और इटली) की वाइन और स्कॉटलैंड की व्हिस्की दुनिया भर में मशहूर हैं। टैक्स कम होते ही भारतीय प्रीमियम ब्रांड्स के लिए अपनी जगह बचाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।