लॉक-इन पीरियड की शुरुआत आमतौर पर हलवा सेरेमनी के बाद होती है। यह रस्म बजट छपाई शुरू होने का संकेत मानी जाती है। जैसे ही हलवा सेरेमनी खत्म होती है, वैसे ही बजट से जुड़े सभी अधिकारी नॉर्थ ब्लॉक या बजट प्रेस परिसर में ‘लॉक’ कर दिए जाते हैं। इसके बाद बजट पेश होने तक वे वहीं रहते हैं।
बजट देश का सबसे संवेदनशील सरकारी दस्तावेज होता है। इसमें टैक्स, सब्सिडी, योजनाएं और नीतिगत फैसले शामिल होते हैं। अगर इसकी जानकारी पहले लीक हो जाए, तो शेयर बाजार में हेराफेरी, आर्थिक नुकसान और राजनीतिक विवाद हो सकता है। इसी वजह से सरकार किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेती।
लॉक-इन के दौरान अधिकारियों के मोबाइल फोन जमा कर लिए जाते हैं। इंटरनेट, सोशल मीडिया, ईमेल और किसी भी तरह के बाहरी संपर्क पर पूरी तरह रोक रहती है। यहां तक कि परिवार से भी संपर्क की इजाजत नहीं होती। यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी जानकारी बाहर न जा सके।
लॉक-इन पीरियड के दौरान अधिकारियों को उसी परिसर में ठहराया जाता है, जहां बजट की छपाई होती है। उनके खाने-पीने, रहने और स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाता है। हालांकि सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन आज़ादी नहीं होती। यह समय पूरी तरह काम और गोपनीयता के लिए समर्पित होता है।
लॉक-इन पीरियड आमतौर पर 7 से 10 दिन तक चलता है। यह अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि बजट कितना बड़ा है और छपाई में कितना समय लग रहा है। बजट पेश होने के बाद ही अधिकारियों को बाहर जाने और फोन इस्तेमाल करने की अनुमति मिलती है।
भले ही आज सब कुछ डिजिटल हो गया हो, लेकिन बजट की छपाई और अंतिम दस्तावेज अब भी बेहद सुरक्षित तरीके से तैयार किए जाते हैं। साइबर लीक, डेटा चोरी और हैकिंग के खतरे को देखते हुए सरकार मानती है कि मानव स्तर पर सख्ती आज भी उतनी ही जरूरी है।
जैसे ही वित्त मंत्री संसद में बजट भाषण पढ़ना शुरू करती हैं, उसी समय लॉक-इन पीरियड खत्म मान लिया जाता है। इसके बाद अधिकारी अपने फोन वापस पा लेते हैं और घर जा सकते हैं। तब जाकर वे अपने परिवार से संपर्क कर पाते हैं और इस लंबी गोपनीय ड्यूटी से बाहर आते हैं।