आमतौर पर सरकार की कमाई (रेवेन्यू) से ज्यादा उसका खर्च होता है। विकास योजनाएं, सैलरी, पेंशन, सब्सिडी, रक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बड़े खर्चों के चलते सरकार की इनकम कम पड़ जाती है। इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ता है। इसी वजह से हर बजट में सरकार यह भी बताती है कि उसे साल भर में कितना कर्ज लेना होगा।
बजट दस्तावेजों के मुताबिक, सरकार की कुल आय का सबसे बड़ा हिस्सा बॉरोइंग यानी कर्ज से आता है। करीब 28 फीसदी पैसा सरकार बॉन्ड्स और अन्य माध्यमों से उधार लेती है। यह कर्ज घरेलू और विदेशी निवेशकों से लिया जाता है। सरकार के लिए कर्ज जुटाने का काम भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) करता है।
सरकार की कमाई में दूसरा बड़ा स्रोत इनकम टैक्स है। कुल रेवेन्यू का करीब 19 फीसदी हिस्सा इनकम टैक्स से आता है। इसमें नौकरीपेशा लोगों, प्रोफेशनल्स और अन्य टैक्सपेयर्स द्वारा दिया गया टैक्स शामिल होता है। जैसे-जैसे देश की आमदनी बढ़ती है, इनकम टैक्स से होने वाली कमाई भी बढ़ती है।
जीएसटी से सरकार को करीब 18 फीसदी रेवेन्यू मिलता है। इसके अलावा कंपनियों से लिया जाने वाला कॉरपोरेट टैक्स लगभग 17 फीसदी योगदान देता है। ये दोनों टैक्स सरकार की आय के मजबूत स्तंभ माने जाते हैं और अर्थव्यवस्था की रफ्तार से सीधे जुड़े होते हैं।
केंद्र सरकार को सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी और कस्टम ड्यूटी से कुल मिलाकर करीब 9 फीसदी पैसा मिलता है। इसके अलावा नॉन-टैक्स रेवेन्यू जैसे डिविडेंड, फीस, ब्याज और सरकारी कंपनियों की कमाई से करीब 7 फीसदी आय होती है। नॉन-डेट कैपिटल रिसीट जैसे विनिवेश से लगभग 1 फीसदी पैसा आता है।
सरकार के कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान और राज्यों को टैक्स में हिस्सेदारी देने में चला जाता है। करीब 20 फीसदी पैसा सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने और राज्यों को उनका हिस्सा देने में खर्च हो जाता है। यह एक अनिवार्य खर्च होता है, जिसे टाला नहीं जा सकता।
सेंट्रल सेक्टर की योजनाओं और अन्य प्रशासनिक खर्चों पर लगभग 16 फीसदी और 9 फीसदी खर्च होता है। रक्षा क्षेत्र, केंद्रीय प्रायोजित योजनाएं और वित्त आयोग के जरिए राज्यों को दिए जाने वाले फंड पर करीब 8-8 फीसदी खर्च किया जाता है। वहीं सब्सिडी का हिस्सा करीब 6 फीसदी और पेंशन पर 4 फीसदी खर्च होता है।
बजट में सरकार की कमाई और खर्च का संतुलन तय करता है कि टैक्स बढ़ेगा या घटेगा, सब्सिडी मिलेगी या नहीं और विकास योजनाओं पर कितना पैसा खर्च होगा। यही वजह है कि बजट का असर सीधे आम आदमी की जेब, नौकरी, महंगाई और बचत पर पड़ता है।