World News Day 2026: आज वर्ल्ड न्यूज डे है। खबरों की दुनिया के लिए यह दिन खास है। इस दुनिया में काम करने वाले लोगों वाकई में दाद के हकदार हैं। यही वो लोग हैं जो दुनिया के हर कोने की खबर हम तक पहुंचाते हैं। चाहे जंग का मैदान हो या फिर कहीं कुदरत का कहर, कोई महामारी हो या फिर राजनीतिक हलचल, अपनी जान जोखिम में डालकर भी ये पत्रकार हम तक खबरें पहुंचाते हैं।
बहुत से बड़े और अजीम शायरों ने इन खबरों और अखबारों पर तमाम खूबसूरत शेर भी गढ़े हैं। आज वर्ल्ड न्यूज डे के इस खास मौके पर आइए पढ़ें ऐसे ही चंद खूबूसरत शेर:
खींचों न कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो
अकबर इलाहाबादी
अख़बारों के पन्नों में जो कल तक था छुपा हुआ
वो सच आज ज़बां पर है मगर डरते-डरते
बशीर बद्र
वो मेरे नाम की चिट्ठी हवा में छोड़ गया
ख़बर मिली है कि अख़बार में छपा हूं मैं
क़तील शिफ़ाई
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
सुबह होती है तो अख़बार का दिल जलता है
रात होती है तो सूरज भी ठहर जाता है
निदा फ़ाज़ली
जो दीप जलाए हैं हमने वो दीप बुझाए जाएंगे
तुम ज़ुल्म की बात करते हो हम हक़ की ख़बर फैलाएंगे
हबीब जालिब
सो जाते हैं फुटपाथ पे अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
मुनव्वर राना
कोई ख़बर हो कि उस बेवफ़ा की बात चले
बहुत दिनों से उदास है शहर आओ ज़रा हँस लें
अहमद मुश्ताक़
बने हैं अहले-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें किससे मुंसिफ़ी चाहें
ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही
न तो तू रहा न तो मैं रहा जो रही सो बे-ख़बरी रही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कितना ख़ौफ़नाक मंज़र था वो मेरे शहर का
लोग अख़बार पढ़ते थे और रोते जाते थे
जौन एलिया
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
हर तरफ़ सच का ढिंढोरा तो पिटा जाता है
कौन सच्चा है ये अख़बार हटा कर देखो
निदा फ़ाज़ली
नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है
हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल
हवा में उड़ती हुई हर ख़बर हमारी है
राहत इंदौरी
सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यों है
इस शहर में हर ख़िफ़्त परेशान सा क्यों है
अख़बार की सुर्खी में जो कल नाम छपा था
वो आज की हवाओं में गुमनाम सा क्यों है
शाहयार
सच की आदत है तो फिर ज़हर पिया कर साक़ी
झूठ छपता है तो अख़बार बिका करते हैं
वसीम बरेलवी
शहर में चर्चा है मेरी बे-नियाज़ी का बहुत
उस तक पहुंची है कि नहीं ये ख़बर पूछो ज़रा
अहमद फ़राज़
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
उस की उड़ती हुई अफ़वाह से डर लगता है
जो ख़बर बनके अख़बार में ढल जाएगा
परवीन शाकिर
न वो बदले न हम बदले न ये दिल की लगी बदली
ख़बर क्या थी कि ये दुनिया बदलते-बदलते बदलेगी
अकबर इलाहाबादी
रात का सन्नाटा जब दिल को डराने लगता है
कोई भूली हुई ख़बर याद दिलाने लगता है
अहमद मुश्ताक़
जो फ़ासले थे हमारे दरमियाँ वो कम न हुए
हज़ार बार हुई गुफ़्तगू ख़बर न हुई
अहमद फ़राज़
