Smriti Mandhana on Bhagwad Gita: यूं तो हर कोई जीतना चाहता है, लेकिन जीवन के बड़े सबक तो हार से ही मिलते हैं। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्टार बल्लेबाज स्मृति मंधाना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक बड़े टूर्नामेंट में मिली निराशा के बाद उन्होंने खुद को संभालने के लिए ऐसा रास्ता चुना, जिसकी चर्चा अब खेल जगत से लेकर आम लोगों के बीच हो रही है। वह रास्ता था भगवद्गीता।
स्मृति मंधाना ने किसी इंटरव्यू में बताया था कि उस सीरीज में हार के बाद उनका मन काफी परेशान था। बार-बार वही पल याद आते थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे दिमाग उस हार से बाहर ही नहीं निकल पा रहा है। ऐसे समय में उन्होंने भगवद्गीता पढ़नी शुरू की। धीरे-धीरे उनकी सोच बदलने लगी।
भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं मानी जाती। कई लोग इसे जीवन प्रबंधन की किताब भी कहते हैं। इसमें बार-बार एक बात कही गई है कि इंसान का अधिकार केवल अपने कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। यही विचार स्मृति मंधाना के लिए भी मेंटल थेरेपी साबित हुआ।
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खेल मनोविज्ञान भी इसी बात का समर्थन करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर खिलाड़ी हर समय केवल नतीजों के बारे में सोचता रहे, तो उसका प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। वहीं जब ध्यान पूरी तरह तैयारी, अभ्यास और वर्तमान पर होता है, तो दबाव कम महसूस होता है। ये सोच खिलाड़ी को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है।
भगवद्गीता पढ़ने के बाद स्मृति ने भी अपने खेल को इसी नजरिए से देखना शुरू किया। उन्होंने समझा कि हर मैच जीता नहीं जा सकता, लेकिन हर बार अपना सर्वश्रेष्ठ देना तो संभव है। हार को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाने के बजाय उसे सीख में बदलना ज्यादा जरूरी है।
मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि किसी बड़ी असफलता के बाद इंसान को एक ऐसे विचार या सिद्धांत की जरूरत होती है, जो उसे मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करे। कुछ लोगों को यह ताकत ध्यान से मिलती है। कुछ को किताबों से। कुछ को आध्यात्मिक विचारों से। महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति निराशा में डूबने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता तलाशे।
स्मृति मंधाना का अनुभव यही संदेश देता है कि सफलता केवल तकनीक या प्रतिभा से नहीं मिलती। मजबूत मानसिकता भी उतनी ही जरूरी होती है। खेल में एक खराब दिन पूरी पहचान तय नहीं करता। अगला मौका हमेशा नया होता है।
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आज दुनिया के कई बड़े खिलाड़ी मानसिक फिटनेस पर उतना ही ध्यान देते हैं, जितना शारीरिक फिटनेस पर। मेडिटेशन, माइंडफुलनेस, किताबें और आत्मचिंतन अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। स्मृति मंधाना का भगवद्गीता की ओर रुख करना भी इसी दिशा में एक उदाहरण माना जा सकता है।
यह कहानी केवल एक क्रिकेटर की नहीं है। यह हर उस व्यक्ति की कहानी है, जिसने कभी हार देखी है। असफलता जीवन का अंत नहीं होती। कई बार वही हमें खुद को बेहतर ढंग से समझने का मौका देती है और शायद यही वजह है कि मुश्किल दौर में कुछ लोग नई प्रेरणा किसी गुरु से, कुछ किसी किताब से और कुछ भगवद्गीता जैसे कालजयी ग्रंथ से खोज लेते हैं।
