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आज जिस 'वर्क कल्चर' पर इतराता है कॉर्पोरेट, दशकों पहले JRD Tata रख गए थे उसकी नींव

JRD Tata Birth Anniversary: जेआरडी टाटा की बैलेंस शीट में हमेशा मुनाफे से पहले इंसान हुआ करते थे। विश्वास हुआ करता था। परफेक्शन होता। क्वालिटी होती।

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वर्क कल्चर का वह अध्याय, जिसके पहले पन्ने पर जेआरडी टाटा का नाम लिखा है>
Authored by: Suneet Singh
Updated Jul 29, 2026, 11:36 IST
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साल 1947 को याद कीजिए। भारत अंग्रेजों की गुलामी की जंजीर तोड़ आजाद हो चुका था। वह आजादी का मायने सीख रहा था। वह ऐसा दौर था जब भारत में फैक्ट्री मालिक या उद्योगपति का मतलब होता था हुक्म देने वाला व्यक्ति। उसके हर हुक्म की तामील हर हाल में होनी चाहिए थी। उसके यहां काम करने वाले कर्मचारी सिर्फ मजदूर थे और उनका काम आदेश मानना था। उसी दौर में एक ऐसा उद्योगपति भी था, जो भारत को आर्थिक और औद्योगिक तौर पर स्वतंत्र बना रहा था। उसने अपने कर्माचारियों को मजदूर नहीं समझा। उसकी नजर में उसके लोग उसका निवेश थे। हम जिस शख्स की बात कर रहे हैं उसका नाम था - जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा।

आज भारत में 8 घंटे की जॉब, एमप्लॉयी सिक्योरिटी, बेटर वर्कप्लेस और प्रोफेशनल मैनेजमेंट जैसी चीजें आम हैं। लेकिन इन सबकी नींव दशकों पहले जेआरडी टाटा रख गए थे। उन दिनों यह सोच बिल्कुल नई थी। जी हां जेआरडी जहां एक तरफ नए-नए उद्योग जमा रहे थे वहीं भारत में आदर्श वर्क कल्चर की नींव भी रख रहे थे। उनका मानना था कि किसी बिजनेस की सफलता को उसके बैलेंस शीट की जगह वहां काम करने वाले लोगों की खुशी से आंकना चाहिए। यही वजह है कि उन्हें आधुनिक कॉर्पोरेट वर्क कल्चर का सबसे बड़ा निर्माता भी कहा जाता है।

(फोटो सोर्स- Tata Group)

(फोटो सोर्स- Tata Group)

हर मुनाफे से पहले इंसान

1938 में जब महज 34 साल की उम्र में जेआरडी टाटा, टाटा संस के चेयरमैन बने, तब टाटा ग्रुप में सिर्फ 14 कंपनियां थीं। अपने कार्यकाल में उन्होंने इसे कई गुना बढ़ाया। इस विस्तार के दौरान उन्होंने एक बात हमेशा याद रखी कि उनके लिए कर्मचारी पहले हैं, कारोबार बाद में। जेआरडी हमेशा कहते थे कि किसी भी कंपनी का सबसे मजबूत आधार उसके खुश और संतुष्ट कर्मचारी होते हैं। उन्होंने इसे अपना मूलमंत्र बनाया।

जेआरडी ने अपने कर्मचारियों को काम करने का ऐसा माहौल दिया कि उन्हें लगता ये तो हमने सोचा ही नहीं था। उनके मन में ऐसी भावना बनने लगी कि कंपनी उसके लिए ये सब कर रही है तो उन्हें भी अपनी नौकरी में अपना शत प्रतिशत देना चाहिए। ऐसे माहौल में लोग कंपनी के काम को अपना काम समझ कर करते। इसी माहौल का उदाहरण जेआरडी अपने कॉर्पोरेट भाषणों में गर्व के भाव से दिया करते कि, देखिए किस तरह से टाटा के कर्मचारी उसके लिए खर्च नहीं निवेश हैं।

मैनेजर और मजदूर, सब एक समान

जेआरडी टाटा की एक खास आदत थी जो उन्हें दूसरे उद्योगपतियों से अलग बनाती थी। वो हमेशा अपने कर्मचारियों की बात सुना करते थे। कर्मचारी उन्हें पत्र लिखते तो वो उसका जवाब खुद लिखकर भेजते। JRD Tata: Letters नाम की किताब में कई ऐसी चिट्ठियों की प्रति मौजूद है जिसमें वह कंपनी के सीनियर मैनेजर से लेकर एक छोटे से मजदूर तक की बात भी समान गंभीरता से सुना करते थे।

जेआरडी टाटा के लेटर्स का संकलन है ये किताब

जेआरडी टाटा के लेटर्स का संकलन है ये किताब

जेआरडी का मानना था कि अगर किसी कर्मचारी की कोई समस्या या सुझाव है तो उसे नजरंदाज कतई नहीं करना चाहिए। अगर वह अपनी बात लेकर चेयरमैन तक पहुंचा है, तो उसे जवाब मिलना चाहिए। इससे भी आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कॉर्पोरेट वर्ल्ड में आज जिस ओपन डोर पॉलिसी और एम्प्लॉयी एंगेजमेंट जैसी बातें की जा रही हैं, जेआरडी इन्हें दशकों पहले अपने व्यवहार से जी रहे थे।

डर को दूर कर काम करते थे लोग

उस दौर में ज्यादातर भारतीय कंपनियां अपने यहां काम करने वाले लोगों को मशीन समझती थी। दूसरी तरफ जेआरडी के साथ काम करने वाले इंसान ही रहे। उनके साथ काम कर चुके कई नामी लोग बता चुके हैं कि उनके केबिन में जाने से पहले कर्मचारी घबराते नहीं थे। अपने पास आने वालों से जेआरडी सवाल पूछते, सुझाव मांगते और असहमतियां भी सुनते। अगर उन्हें लगता कि किसी कर्मचारी का कोई सुझाव कंपनी की पॉलिसी से बेहतर है तो उसे स्वीकार करने में कभी झिझक नहीं दिखाते। आज इस तरह के वर्क कल्चर को कोलैबरेटिव लीडरशिप कहा जाता है।

क्वालिटी से नहीं करते समझौता

जेआरडी टाटा का एक फेमस कोट है- Always aim at perfection. You will achieve excellence. उनका मानना था कि इंसान को अपने काम में कभी औसत से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। भले ही परफेक्ट कर पाना मुश्किल हो, लेकिन सामान्य से कहीं बेहतर तो हो ही सकता है। यह सोच लगातार सीखने, सुधार करने और छोटी-छोटी गलतियों पर भी ध्यान देने की आदात डालती है। उनको पूरा विश्वास था कि अगर हम लगातार बेहतर बनने की कोशिश करते रहेंगे तो एक दिन परफेक्ट जरूर बन जाएंगे।

इस सोच को टाटा के साथ काम करने वाला हर छोटा बड़ा कर्मचारी जीता था। अगर किसी प्रोडक्ट या सर्विस में कमी होती, तो जेआरडी उसे स्वीकार करने से नहीं डरते थे। उनका मानना था कि खराब क्वालिटी से कमाया गया मुनाफा लंबे समय तक नहीं टिकता।

(फोटो सोर्स: Tata Group)

(फोटो सोर्स: Tata Group)

फ्लाइट के ऐश ट्रे तक चेक करते जेआरडी

आर. एम. लाला ने जेआरडी टाटा की बायोग्राफी Beyond the Last Blue Mountain में लिखा है कि एयर इंडिया की अपनी किसी भी फ्लाइट में वो अचानक पहुंच जाते थे। पैसेंजर्स को परोसा जाने वाला खाना चखते। सीटें देखते। पर्दे का कपड़ा देखते। यहां तक कि ऐशट्रे साफ है या नहीं, इस पर भी ध्यान देते थे। उनका मानना था कि ग्राहक छोटी से छोटी बात याद रखता है। इसलिए क्वालिटी कभी समझौते का विषय नहीं हो सकती। जेआरडी टाटा ने जिस तरह से बिजनेस में क्वालिटी कल्चर की अलख जगाई उसे आगे चलकर बहुत सी देसी-विदेशी कंपनियों ने अपनाया।

खुश कर्मचारी-सफल कारोबार

जेआरडी टाटा का मत था कि किसी कर्मचारी से अच्छा काम तभी लिया जा सकता है, जब उसे सम्मान और सुरक्षा मिले। इसी सोच के कारण टाटा समूह में कर्मचारी कल्याण, सुरक्षा और स्वास्थ्य पर लगातार निवेश किया गया।

इस सोच का असर था कि टाटा समूह ने कर्मचारियों के लिए कई ऐसे कदम उठाए, जो बाद में भारत में श्रम सुधारों का हिस्सा बने। आठ घंटे का वर्किंग हावर, पेड़ लीव, प्रोविडेंट फंड और बेनेवेलेट फंड जैसी कई सुविधाएं टाटा ग्रुप कानून बनने से बहुत पहले से ही अपना रहा था। इनमें से कुछ पहल की शुरुआत जमशेदजी टाटा और सर दोराबजी टाटा के दौर में हुई थी, लेकिन जे.आर.डी. ने उन्हें आगे बढ़ाया और संस्थागत रूप दिया।

जेआरडी ने मैनेजर नहीं, लीडर तैयार किए

जेआरडी का विश्वास था कि किसी कंपनी की सफलता सिर्फ चेयरमैन पर निर्भर नहीं हो सकती। वे ऐसे लोगों को आगे बढ़ाते थे, जो स्वतंत्र फैसले ले सकें। वे जिम्मेदारी सौंपते, भरोसा करते और खुलकर काम करने का माहौल देते। जेआरडी ने ना जाने कितने ही बड़े बिजनेस लीडर्स तैयार किये जिन्होंने आगे चलकर उद्योग जगत की दशा ही बदल दी।

इसकी एक बानगी देखिए। 1944 में वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने जेआरडी टाटा को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने भारत में विश्वस्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान बनाने की जरूरत बताई। जेआरडी चाहते तो उसे नजरंदाज कर सकते थे। लेकिन उन्होंने भाभा के सपने पर भरोसा जताया।

टाटा ट्रस्ट्स के सहयोग से 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना हुई। आगे चलकर यही संस्थान भारत के परमाणु और अंतरिक्ष कार्यक्रम की बौद्धिक नींव बना। इस वाकये से भी आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जेआरडी विचारों में निवेश करने वाली शख्सियत भी थे।

जेआरडी टाटा के साथ रतन टाटा (Photo: Ratan Tata Twitter)

जेआरडी टाटा के साथ रतन टाटा (Photo: Ratan Tata Twitter)

रतन टाटा ने उनसे क्या सीखा?

दिवंगत रतन टाटा जेआरडी टाटा को अपना बॉस नहीं मार्गदर्शक कहा करते थे। उनके मुताबिक जे.आर.डी. लोगों की बात ध्यान से सुनते थे। वे सम्मान कमाते थे, मांगते नहीं थे। उन्होंने सिखाया कि नेतृत्व का मतलब उचित निर्णय लेने के साथ ही सही मूल्यों पर टिके रहना भी है। यही वजह है कि 1991 में जब रतन टाटा ने समूह की कमान संभाली, तो उन्होंने जे.आर.डी. की मानवीय नेतृत्व शैली को आगे बढ़ाने की कोशिश की।

भारत के असली रत्न साबित हुए जेआरडी

साल 1992 में भारत सरकार ने जेआरडी टाटा को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। अगर आप ये समझ रहे हैं कि यह सम्मान उन्हें सिर्फ टाटा इंडस्ट्रीज जैसा बड़ा उद्योग खड़ा करने के लिए मिला तो आप गलत हैं।

जेआरडी टाटा को 1992 में मिला भारत रत्न (AI Image)

जेआरडी टाटा को 1992 में मिला भारत रत्न (AI Image)

उन्हें ये सम्मान इसलिए मिला कि उन्होंने भारत को आधुनिक भारत बनाने के लिए लगभग हर क्षेत्र में निवेश किया । ऐसी संस्थाएं खड़ी कीं जो किसी भी व्यक्ति विशेष से बड़ी थी। आज जब कंपनियों की सफलता का पैमाना तिमाही मुनाफा बन गया है, जेआरडी की राह बिल्कुल जुदा थी। उनके बैलेंस शीट में इंसान हुआ करते थे। विश्वास हुआ करता था। परफेक्शन होता। क्वालिटी होती। और सबसे अहम समाज और राष्ट्र के लिए जिम्मेदारी होती थी।

इसी जिम्मेदारी को सर्वोपरी रखते हुए जेआरडी टाटा ने अपने जीवन का मूलमंत्र बना लिया था कि आर्थिक सफलता तब तक अधूरी है, जब तक उससे देश और समाज का भला न हो।

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