लाइफस्टाइल

गट हेल्थ पर फोकस: क्यों तेजी से बढ़ रहा है प्रोबायोटिक डाइट का ट्रेंड?

आज के दौर में 'एब्स' से ज्यादा चर्चा 'आंतों' (गट) की हो रही है, और यह बदलाव काफी जरूरी और स्वागत योग्य है। यही वजह है कि प्रोबायोटिक डाइट का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। आइए जानते हैं प्रोबायोटिक डाइट के बढ़ते ट्रेंड के बारे में विस्तार से...

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प्रोबायोटिक्स और गट हेल्थ का कनेक्शन

Gut Health and Probiotic Diet: कुछ साल पहले तक फिटनेस का मतलब सिर्फ जिम में पसीना बहाना और कैलोरी बर्न करना था। लेकिन आज सेहत की परिभाषा 'सिक्स-पैक' से खिसक कर हमारे पेट के अंदरूनी संसार यानी 'माइक्रोबायोम' पर टिक गई है। फिटनेस की दुनिया में इन दिनों एक शब्द गूंज रहा है गट हेल्थ। और इसी के साथ 'प्रोबायोटिक डाइट' अब केवल डायटिशियन की फाइलों तक सीमित न रहकर हमारी किचन का स्टार बन गई है। लोग अब गट हेल्थ को भी काफी अहमियत देने लगे हैं, यही कारण है कि प्रोबायोटिक डाइट का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। आइए समझते हैं इसके बारे में विस्तार से...

क्या है प्रोबायोटिक डाइट?

हमारी आंतों में करोड़ों सूक्ष्मजीव रहते हैं। इसे एक जंगल की तरह समझिए, जहां अच्छे और बुरे दोनों तरह के बैक्टीरिया मौजूद हैं। जब अच्छे बैक्टीरिया (प्रोबायोटिक) की तादाद कम होती है, तो शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है। प्रोबायोटिक डाइट असल में उन 'लाइव गुड बैक्टीरिया' को शरीर में पहुंचाने का जरिया है, जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हैं।

हेल्दी प्रोबायोटिक्स में घर का जमा गाढ़ा दही, चटपटी कांजी, दक्षिण भारत की जान इडली-डोसा हो या फिर विदेशी स्वाद वाला किमची और काम्बुचा शामिल हैं। ये सभी फूड्स प्रोबायोटिक्स के पावरहाउस हैं।

गट हेल्थ क्यों है जरूरी?

हमारी आंतों में करोड़ों बैक्टीरिया रहते हैं, जो भोजन पचाने, पोषक तत्वों को अवशोषित करने और शरीर को संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो गैस, ब्लोटिंग, कब्ज, थकान और यहां तक कि स्किन प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं। कई हेल्थ रिसर्च यह बताती है कि गट हेल्थ का सीधा संबंध मेंटल हेल्थ से है। हमारी आंतों और दिमाग के बीच “गट-ब्रेन कनेक्शन” होता है। इसलिए जब पाचन सही रहता है, तो मूड और एनर्जी लेवल भी बेहतर रहते हैं।

क्यों बढ़ा प्रोबायोटिक्स का क्रेज?

  • गट-ब्रेन कनेक्शन- अब विज्ञान भी मानता है कि पेट सिर्फ खाना पचाने की मशीन नहीं, बल्कि हमारा 'दूसरा दिमाग' है। जब आपका पेट खुश रहता है, तो आपका मूड बेहतर होता है और स्ट्रेस लेवल भी कंट्रोल में रहता है।
  • महामारी के बाद की सजगता- दुनिया ने कोविड-19 महामारी के बाद सीखा कि असली सुरक्षा कवच हमारी इम्यूनिटी है। चूंकि शरीर की 70-80% इम्यून कोशिकाएं आंतों में होती हैं, इसलिए प्रोबायोटिक्स इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में उभरे हैं।
  • बदलती लाइफस्टाइल की मांग- आज हमारी लाइफस्टाइल में प्रोसेस्ड फूड और एंटीबायोटिक्स के बढ़ते इस्तेमाल ने हमारे नेचुरल गट फ्लोरा को भारी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में लोग अब 'नेचुरल हीलिंग' की ओर लौट रहे हैं। इसलिए प्रोबायोटिक्स का चलन काफी बढ़ गया है।

सप्लीमेंट्स या नेचुरल सोर्स क्या है हेल्दी ऑप्शन?

मार्केट में प्रोबायोटिक कैप्सूल और ड्रिंक्स की भरमार है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि सप्लीमेंट्स की बजाय नेचुरल सोर्स से प्रोबायोटिक्स लेना ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी हो सकता है। इसमें घर का बना दही, फर्मेंटेड ड्रिंक और संतुलित आहार लंबे समय तक बेहतर परिणाम दे सकते हैं। हालांकि आपको किसी भी तरह की पाचन संबंधी समस्या है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

gulshan kumar
गुलशन कुमारauthor

गुलशन कुमार टाइम्स नाउ हिंदी डिजिटल के हेल्थ सेक्शन से जुड़े हैं। फिटनेस और योग के प्रति उनकी रुचि उन्हें हेल्थ जर्नलिज्म की ओर लेकर आई, जहां वे आम लोगों की जीवनशैली, सेहत और वेलनेस से जुड़े विषयों पर लगातार काम कर रहे हैं। गुलशन अबतक 2,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। उनके लेखों में आसान भाषा में दी गई जानकारी, रिसर्च-बेस्ड टिप्स और रोजमर्रा की सेहत से जुड़े विषयों की स्पष्ट समझ दिखाई देती है। हेल्थ अवेयरनेस को बढ़ावा देना, फिटनेस को सरल तरीके से समझाना और बेहतर लाइफस्टाइल के लिए उपयोगी सुझाव देना—गुलशन की लेखन शैली की खासियत है।

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