बच्चे जब पहली बार घर से दूर पढ़ाई या नौकरी के लिए जाते हैं, तो उनके लिए यह नई जिंदगी की शुरुआत होती है। दूसरी तरफ माता-पिता के लिए यह वक्त उतना आसान नहीं होता। घर वही रहता है, कमरे वही रहते हैं, लेकिन बच्चों की चहलकदमी गायब हो जाती हैं।
फिल्ममेकर फराह खान कुंदर इन दिनों इसी बदलाव से गुजर रही हैं। उनके तीनों बच्चे सीजर, दिवा और अन्या उच्च शिक्षा के लिए तीन अलग-अलग शहरों और कैंपस में चले गए हैं। सोशल मीडिया पर अपनी भावनाएं साझा करते हुए फराह ने लिखा कि अगर एक बच्चे को कॉलेज भेजना मुश्किल लगता है, तो तीन बच्चों को एक साथ तीन शहरों में भेजने की कल्पना कीजिए। उन्होंने बच्चों से कहा कि वे अपनी जिंदगी जिएं, लेकिन यह भी याद रखें कि उनके लिए घर हमेशा माता-पिता के पास ही रहेगा।
मनोवैज्ञानिक मानते है कि फराह की ये पोस्ट इस तरफ इशारा करती है कि वह 'एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम’ को फेस कर रही हैं। इस सिंड्रोम के कारण इंसान अकेलापन, उदासी, चिंता या खालीपन सा महसूस करता है। पेरेंट्स को लगता है कि बच्चों के चले जाने से बतौर माता-पिता उनकी जिम्मेदारी पूरी तरह से बदल जाती है।
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि उन माता-पिता के लिए यह बदलाव ज्यादा गहरा होता है जिनकी दिनचर्या लंबे समय से बच्चों के आसपास बनी रही हो। वो कुछ उपाय बताते हैं कि फराह खान जैसे पेरेंट्स इस एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम से कैसे निपटें:
माता-पिता की भूमिका बदलती है, खत्म नहीं होती
बच्चे के कॉलेज जाने के बाद रिश्ता खत्म नहीं होता, उसका स्वरूप बदलता है। अब हर फैसले में शामिल होने के बजाय माता-पिता को एक ऐसे वयस्क बच्चे के साथ रिश्ता बनाना होता है, जिसे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने हैं।
इस दौरान लगातार फोन करना, हर घंटे अपडेट मांगना या बच्चे की लोकेशन पर नजर रखना चिंता से पैदा हो सकता है, लेकिन बच्चे को यह नियंत्रण जैसा महसूस हो सकता है। बेहतर है कि दोनों मिलकर बातचीत और संपर्क का ऐसा तरीका तय करें जो बच्चे की आजादी और माता-पिता की भावनात्मक जरूरत, दोनों का सम्मान करे।
अपनी पूरी दुनिया बच्चों के इर्द-गिर्द न रखें
बच्चों के जाने के बाद सबसे जरूरी काम है अपनी जिंदगी को फिर से भरना। पुराने दोस्तों से मिलना, किसी शौक को समय देना, यात्रा करना, काम पर ध्यान देना या लंबे समय से टाली जा रही किसी पसंदीदा गतिविधि को शुरू करना मददगार हो सकता है।
विशेषज्ञ के मुताबिक, जब माता-पिता की अपनी भावनात्मक दुनिया मजबूत होती है, तो वे बच्चे से लगातार साथ या आश्वासन मांगने पर कम निर्भर होते हैं। इससे रिश्ते में भी सहजता बनी रहती है।
सलाह देने से पहले सुनें
बच्चा घर से दूर है तो हर फोन कॉल को सलाह देने का मौका बना देना भी ठीक नहीं। बड़े हो चुके बच्चों को कई बार समाधान नहीं, सिर्फ किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उनकी बात सुने।
माता-पिता को अपने अनुभवों से हर फैसला तय करने या बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करने से भी बचना चाहिए। अब उन्हें रास्ता बताने से ज्यादा भरोसा करने की जरूरत होती है।
बच्चों को रोककर रखना आसान नहीं, उन्हें उड़ने देना भी आसान नहीं। लेकिन स्वस्थ माता-पिता-बच्चे का रिश्ता शायद वहीं बनता है, जहां दूरी बढ़ने के बावजूद भरोसा कम नहीं होता। बच्चे अपना घर छोड़ सकते हैं, लेकिन माता-पिता की जिंदगी उनसे आगे भी चलती है।
