लाइफस्टाइल

Auto Pilot Parenting: साथ होकर भी साथ नहीं.. क्या होती है ऑटो पायलेट पेरेंटिंग, जो बिगाड़ रही पेरेंट्स-बच्चों के बीच का रिश्ता

Auto Pilot Parenting (ऑटो पायलेट पेरेंटिंग): व्यस्त जीवन में आजकल कई पेरेंट्स ऐसे हैं, जो बच्चों के साथ तो रहते हैं लेकिन उनका ध्यान कहीं और रहता है। जिस कारण बच्चों पर तो उनके रिश्तों पर बुरा असर पड़ सकता है। इस तरह की पेरेंटिंग को खास नाम दिया है, जाने विस्तार से क्या होती है ऑटो पायलेट पेरेंटिंग।

Image

What is Auto Pilot Parenting (Photo Credit - Canva)

Auto Pilot Parenting (ऑटो पायलेट पेरेंटिंग): आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में पेरेंट्स काम, घर तो बच्चों पर एक साथ अपना ध्यान देने की कोशिश करते हैं। हालांकि एक साथ अगर आप हर वक्त बहुत सारे कामों पर ध्यान दें तो संभावना है कि काम बिगड़ सकता है। ऐसी स्थिति में या तो लोग काम पर ध्यान नहीं दे पाते हैं या बच्चों की परवरिश पर और आज के व्यस्त जीवन में पेरेंटिंग की एक ऐसी ही नई शैली उभर रही है, जिसे विशेषज्ञ ‘ऑटो-पायलेट पेरेंटिंग’ कहते हैं। यहां विस्तार से जाने आखिर क्या होती है ऑटो पायलेट पेरेंटिंग।

क्या होती है ऑटो पायलेट पेरेंटिंग

ऑटो पायलेट पेरेंटिंग वह स्थिति है जब माता-पिता शारीरिक रूप से तो अपने बच्चे के साथ होते हैं, लेकिन उनका ध्यान उन पर न होकर अपने स्मार्टफोन, लैपटॉप या अन्य डिजिटल उपकरणों पर केंद्रित होता है। शाब्दिक अर्थ की बात करें तो बिना सक्रिय रुचि के पेरेंटिंग को ऑटो पायलेट पेरेंटिंग कहा जा सकता है। इसमें माता पिता बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से अनुपस्थित होते हैं।

बच्चा खेल रहा हो, पढ़ रहा हो या बात कर रहा हो, माता-पिता का ध्यान लगातार स्क्रीन से जुड़ा रहता है। इसका मुख्य कारण काम का दबाव, तनाव और डिजिटल उपकरणों की लत बताई जा रही है।

क्या है नुकसान

बच्चे पालना बहुत ही मुश्किल काम होता है। लेकिन उनकी परवरिश करते वक्त लापरवाही बरतना बहुत ही गलत हो सकता है। इस तरह की पेरेंटिंग का बच्चों के दिमाग पर बहुत खराब असर होता है। माना जाता है कि, ऐसी स्थिति बच्चों के मानसिक विकास के लिए हानिकारक है। बच्चे को लगातार नजरअंदाज किए जाने से उसके अंदर हीनभावना, अकेलापन और आत्मविश्वास की कमी पैदा होती है। वह महसूस करता है कि उसकी बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं।

क्या करें

इस तरह की पेरेंटिंग किसी भी मां-बाप को नहीं करनी चाहिए। अपने बच्चों की भावनात्मक जरुरतों को पूरा किया ही जाना चाहिए। इस तरह की स्थिति पैदा होने से बचाव करना आवश्यक है, इसके लिए डिजिटल डिटॉक्स किया जाना अनिवार्य है। जिसमें माता पिता को बच्चों के साथ कुछ घंटे बिना फोन या कोई डिजिटल गैजेट तो ऑफिस, परिवार आदि के तनाव की बातों को साइड में रखकर बिताने होंगे।

पेरेंट्स के लिए जरूरी है कि, वे अपने बच्चों की बातें सुने और उनकी भावनाओं को समझें। सच्ची पेरेंटिंग सिर्फ शारीरिक उपस्थिति नहीं होती है, बल्कि पूर्ण मानसिक और भावनात्मक सपोर्ट भी बहुत ही ज्यादा आवश्यक होता है।

Avni Bagrola
अवनी बागरोलाauthor

अवनी बागरोला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के लाइफस्टाइल सेक्शन में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। फैशन, ब्यूटी, ट्रेंड्स, पर्सनल स्टाइलिंग और आधुनिक जीवनशैली से जुड़े कंटेंट पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें युवा और स्टाइल-सेवी ऑडियंस के बीच खास पहचान दिलाती है। अवनी की लेखन शैली सरल, ट्रेंडी और यूज़र-फ्रेंडली है, जो पाठकों को तेजी से बदलते फैशन व लाइफस्टाइल ट्रेंड्स को समझने में मदद करती है। अब तक 2,500 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुकी अवनी क्रिएटिव अप्रोच, अपडेटेड नॉलेज और रियल-टाइम ट्रेंड सेंस के लिए जानी जाती हैं।

और पढ़ें
End of Article