आज की शायरी में पढ़ें साकिब लखनवी का मशहूर शेर, अपनों को ही बेपर्दा करता है यह शेर
- Authored by: Suneet Singh
- Updated Jan 3, 2026, 10:45 AM IST
Saqib Lakhnavi Shayari (साकिब लखनवी की शायरी), Aaj ki Shayari: साकिब लखनवी अपने इस शेर से हमें सिखाते हैं कि हर मुस्कुराता चेहरा अपना नहीं होता और हर सहारा आखिरी वक्त तक साथ देगा, यह जरूरी नहीं। यह शेर भरोसे के टूटने, अकेले पड़ जाने और अपनों से मिले दर्द की बेहद मार्मिक तस्वीर पेश करता है, जिसे पढ़कर हर संवेदनशील इंसान खुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस करता है।
आज की शायरी (Shayari of the Day)
Shayari of The Day (आज की शायरी): साकिब लखनवी(Saqib Lakhnavi) का नाम उन चंद शायरों में शुमार है, जिन्होंने कम शब्दों में असरदार बात कहने की कला को बखूबी साधा। उनकी शायरी में जिंदगी के तजुर्बे, रिश्तों की कड़वाहट, विश्वासघात और इंसानी संवेदनाओं की सच्ची झलक मिलती है। साकिब लखनवी का अंदाज सादा, सहज और असरदार है, जिससे उनकी नज्में सीधे दिल को छूती हैं। उनके कई शेर आम बोलचाल का हिस्सा बन चुके हैं, जो आज भी इंसान के दर्द, अकेलेपन और टूटे भरोसे की कहानी कहते हैं। आज की शायरी में आइए नजर डालते हैं साकिब लखनवी के एक मशहूर शेर:
"बाग़बां ने आग दी जब आशियाने को मिरे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे"
साकिब लखनवी का यह शेर बहुत गहरी पीड़ा, विश्वासघात और जीवन के कटु अनुभव को बेहद सादे लेकिन असरदार ढंग से बयां करता है। इस शेर में शायर अपनी जिंदगी के उन हालात की बात करता है, जब उसे सबसे ज्यादा चोट वहीं से मिलती है, जहां से सुरक्षा और सहारे की उम्मीद थी।
यहां बागबां का इस्तेमाल उस व्यक्ति या व्यवस् के लिए किया गया है जिसे संरक्षण देने वाला माना जाता है। जैसे अपने लोग, रिश्तेदार, समाज, संस्था या सत्ता। बागबां का काम पौधों की देखभाल करना होता है, लेकिन जब वही आशियाने को आग लगा दे, तो यह घोर विश्वासघात कहलाता है।
आशियाना इंसान का घर, उसका सुकून, उसकी पहचान और उसका सुरक्षित संसार है। जब इस आशियाने पर आग लगती है तो इंसान भीतर से टूट जाता है।
शेर के दूसरे मिसरे में तकिया सहारे का प्रतीक है। यानी जिन लोगों, रिश्तों या चीजों पर उसने भरोसा किया था, वही मुसीबत के वक्त साथ देने की बजाय हालात को और बिगाड़ने लगे। आग लगी है और जिनसे उम्मीद थी कि वे उसे बुझाने में मदद करेंगे, वही हवा देकर आग को और भड़काने लगे।
यह शेर उन हालात पर बिल्कुल फिट बैठता है, जब इंसान मुश्किल में होता है और अपने ही लोग उसका साथ छोड़ देते हैं। कई बार परिवार, दोस्त, सहयोगी या समाज वही होते हैं जो संकट में सबसे पहले दूर हो जाते हैं या हालात का मजाक बनाते हैं। यह दर्द इसलिए और गहरा हो जाता है क्योंकि चोट किसी गैर से नहीं बल्कि अपनों से मिलती है।
इस शेर की सबसे बड़ी ताकत इसकी सच्चाई है। ज़िंदगी में अकसर ऐसा होता है कि दुश्मन से ज्यादा नुकसान अपने ही कर जाते हैं। कभी जानबूझकर, कभी स्वार्थ में और कभी निषपक्ष रहकर।
साकिब लखनवी अपने इस शेर से हमें सिखाते हैं कि हर मुस्कुराता चेहरा अपना नहीं होता और हर सहारा आखिरी वक्त तक साथ देगा, यह जरूरी नहीं। यह शेर भरोसे के टूटने, अकेले पड़ जाने और अपनों से मिले दर्द की बेहद मार्मिक तस्वीर पेश करता है, जिसे पढ़कर हर संवेदनशील इंसान खुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस करता है।
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