Mughal Intersting Facts: मुगलों के बारे में खूब लिखा और पढ़ा गया है। मुगलों की जीवनशैली के बारे में भी आपको इंटरनेट पर ढेर सारी जानकारियां मिल जाएंगी। मुगल क्या खाते थे, क्या पहनते थे, कैसे रहते थे, हर तरह की जानकारी उपलब्ध है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब साबुन या सर्फ का आविष्कार नहीं हुआ था, उस जमाने में मुगल अपने कीमती कपड़े कैसे धोते थे? कैसे वह अपने शाही लिबास की देखभाल किया करते थे?
बेशकीमती होते थे मुगलों के शाही लिबास
मुगल अपने पहनावे के लिए हमेशा चर्चा में रहे। उनके लिए उस दौर में मौजूद सबसे महंगे धागों से कपड़े बनाए जाते थे। मुगल बादशाहों और रानियों के शाही लिबास को ना सिर्फ रेशम के कपड़ों से बनाया जाता था बल्कि उनमें हीरे जवाहरात भी जड़े जाते थे। बहुतों के लिबास तो सोने के तार से सिले जाते थे। माना कि मुगलों के पास संपत्ति की कमी नहीं थी, फिर भी इतने महंगे कपड़ों की धुलाई और रखरखाव एक बड़ी चुनौती थी। ये वाकई गौर करने वाली बात है कि जब धोने के लिए साबुन और डिटर्जेंट पाउडर नहीं बने थे तब मुगल किस तरह से अपने कपड़े धुलते थे।

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मुगल कैसे धोते थे अपने कपड़े
साबुन सर्फ के आविष्कार से पहले भारत की धरती पर कई ऐसी चीजें थीं जिन्हें धुलाई के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इनमें से सबसे प्रमुख था रीठा। भारत जैसे खनिज और वनस्पति प्रधान देश में रीठा आसानी से उपलब्ध होने वाली वनस्पति थी। महंगे रेशमी वस्त्रों को कीटाणु मुक्त और साफ करने के लिए रीठा आज भी सबसे बेहतरीन ऑर्गेनिक प्रोडक्ट है। पानी में रीठा को डालकर उसे उबाला जाता था। उबालने से पानी में झाग बन जाता था। उस झाग वाले पानी में कपड़े डालकर उन्हें हाथ से रगड़कर धोया जाता था। जिन कपड़ों में कोई रत्न नहीं जड़े होते थे उन्हें पत्थर या लकड़ी पर रगड़ कर साफ किया जाता था। रीठा से ना सिर्फ कपड़े चमकते थे बल्कि कीटाणुमुक्त भी हो जाते थे। मुगल बादशाह अपने महल के अंदर ही रीठा के पेड़ लगवाया करते थे। जहां ये पेड़ नहीं लग पाते थे उन्हें सल्तनत के दूसरे हिस्सों से मंगवाया जाता था।

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रीठा के अलावा था एक और तरीका
मुगल काल में कपड़े धुलने के लिए रेह का भी इस्तेमाल किया जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों में खाली पड़ी जमीन पर, नदी-तालाब के किनारे या खेतों में किनारे पर सफेद रंग का पाउडर जमा हो जाता है। इसे ही रेह कहा जाता है। भारत में ये आसानी से उपलब्ध है। इस रेह को पानी में मिलाकर और फिर उसे गर्म कर कपड़ों की धुलाई के लिए इस्तेमाल किया जाता था। बता दें कि रेह में सोडियम सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट और कैल्शियम सल्फेट होता है। इसमें सोडियम हाइपोक्लोराइट भी पाया जाता है। ये केमिकल्स कपड़ों को लंबे समय तक कीटाणुमुक्त रखते हैं।
भारत में कब आया साबुन
भारत में नॉर्थ वेस्ट सोप कंपनी ने मेरठ में 1897 में पहली साबुन साबुन की फैक्ट्री लगाई थी। साबुन का कारोबार खूब फायदेमंद साबित हुआ। इसके बाद तब देश के सबसे अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने साबुन निर्माण की फैक्ट्री डाली। तब सोडे और तेल को मिलाकर साबुन तैयार किया जाता था।
