Parenting: बच्चे के जन्म के साथ ही माता-पिता का भी जन्म होता है। इसके साथ शुरू होती है सही परवरिश की चुनौती। आज बाजार में पेरेंटिंग पर सैकड़ों किताबें हैं। इंटरनेट पर हजारों वीडियो और एक्सपर्ट्स की सलाह भी मिल जाती है। फिर भी परवरिश का सही मतलब अनुभव से ही समझ आता है। समय के साथ माता-पिता कुछ ऐसी बातें सीखते हैं, जो किसी गाइडबुक में नहीं लिखी होतीं:
प्यार बराबर होता है, एक जैसा नहीं
अगर घर में दो या उससे ज्यादा बच्चे हैं, तो माता-पिता जल्दी समझ जाते हैं कि हर बच्चे की जरूरतें अलग होती हैं। किसी बच्चे को ज्यादा समय चाहिए, किसी को ज्यादा भरोसा और किसी को ज्यादा भावनात्मक सहारा। इसीलिए प्यार जताने का तरीका अलग होता है।
अपराधबोध हर माता-पिता का साथी है
अच्छे माता-पिता भी कई बार सोचते हैं कि कहीं उन्होंने गलती तो नहीं कर दी। क्या उन्हें बच्चे के साथ और समय बिताना चाहिए था? क्या उन्होंने ज्यादा डांट दिया? यह अपराधबोध यह दिखाता है कि आप अपने बच्चे की परवाह करते हैं और बेहतर माता-पिता बनने की कोशिश कर रहे हैं।
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प्यार करना आसान है, धैर्य रखना मुश्किल
सारे पेरेंट्सअपने बच्चे से प्यार करते हैं। असली चुनौती तब आती है, जब बच्चा जिद करता है, गुस्सा करता है या आपकी बात नहीं मानता। ऐसे समय में शांत रहना, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना और सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना ही पेरेंटिंग की असली परीक्षा होती है।
स्थायी नहीं कोई तरीका
जो तरीका तीन साल के बच्चे के साथ काम करता है, वह 13 साल के किशोर के साथ शायद बिल्कुल काम न करे। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनकी भावनाएं, जरूरतें और सोच बदलती रहती हैं। इसलिए अच्छे माता-पिता भी समय के साथ खुद को बदलना सीखते हैं।
बच्चों से मिलता है बड़ा सबक
माना जाता है कि माता-पिता बच्चों को सिखाते हैं। लेकिन सच यह है कि बच्चे भी अपने व्यवहार से बहुत कुछ सिखाते हैं। कई माता-पिता कहते हैं कि बच्चे के आने के बाद उन्होंने खुद को नए तरीके से समझना शुरू किया।
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परफेक्ट जैसा कुछ नहीं होता
हर समय सही फैसला लेना संभव नहीं है। बच्चे ऐसे माता-पिता नहीं चाहते जो कभी गलती न करें। उन्हें ऐसे माता-पिता चाहिए जो गलती होने पर उसे स्वीकार करें, माफी मांग सकें और उससे सीखने का साहस रखें। यही ईमानदारी बच्चों को भी बेहतर इंसान बनाती है।
पेरेंटिंग में कोई अंतिम परीक्षा नहीं होती और न ही कोई ऐसा दिन आता है, जब आप कह सकें कि अब सब सीख लिया। हर उम्र के साथ बच्चे बदलते हैं और माता-पिता भी। इसलिए खुद पर जरूरत से ज्यादा दबाव डालने के बजाय इस सफर को सीखने की प्रक्रिया की तरह अपनाइए।
पेरेंटिंग केवल बच्चे की परवरिश नहीं है। यह माता-पिता के भीतर भी बदलाव लाती है। यह आपको ज्यादा धैर्यवान, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाती है। कई बार बच्चा बड़ा होने से पहले माता-पिता को बड़ा बना देता है। यही इस सफर की सबसे खूबसूरत बात है।
