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Holi 2024 Poems: भारतेंदु से हरिवंशराय बच्चन तक, इन कवी की रचनाओं के बिना अधूरा है रंगों का त्योहार, यहां पढ़ें होली की प्रसिद्ध कविताएं

होली का त्योहार कुछ कवियों की कविताओं के बिना अधूरा सा लगता है। ऐसे में आज हम आपके लिए मशहूर कवियों की चुनिंदा रचनाएं लेकर आए हैं जिन्हें पढ़कर आप होली को और भी रंगीन बना सकते हैं।

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Holi 2024 Poems

Holi Poems in Hindi: होली का त्योहार इस साल 25 मार्च को मनाया जाएगा। होली का त्योहार जीवन में खुशियां लेकर आता है। इस त्योहार को देशभर में खूब धूम धाम के साथ मनाया जाता है। इस मौके पर रंग खेलने के साथ साथ लोग होली के प्रसिद्ध गाने और कविताएं सुनते हैं। होली के मौके पर कई जगहों पर कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया जाता है जहां कवि अपनी खूबसूरत कविताओं से होली के त्योहार का बखान करते हैं और लोगों को गुदगुदाते हैं। होली का त्योहार कुछ कवियों की कविताओं के बिना अधूरा सा लगता है। ऐसे में आज हम आपके लिए मशहूर कवियों की चुनिंदा रचनाएं लेकर आए हैं जिन्हें पढ़कर आप होली को और भी रंगीन बना सकते हैं।

होली की मशहूर कविताएं

गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में / भारतेंदु हरिश्चंद्र

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में

बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में

नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे

ये आशिक की है उमड़ी आहें आतिशबार होली में

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो

मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुछ है

बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में

रस गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी

नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में...

होली की रात- जयशंकर प्रसाद

बरसते हो तारों के फूल

छिपे तुम नील पटी में कौन?

उड़ रही है सौरभ की धूल

कोकिला कैसे रहती मीन।

चाँदनी धुली हुई हैं आज

बिछलते है तितली के पंख।

सम्हलकर, मिलकर बजते साज

मधुर उठती हैं तान असंख।

तरल हीरक लहराता शान्त

सरल आशा-सा पूरित ताल।

सिताबी छिड़क रहा विधु कान्त

बिछा हैं सेज कमलिनी जाल।

पिये, गाते मनमाने गीत

टोलियों मधुपों की अविराम।

चली आती, कर रहीं अभीत

कुमुद पर बरजोरी विश्राम।

उड़ा दो मत गुलाल-सी हाय

अरे अभिलाषाओं की धूल।

और ही रंग नही लग लाय

मधुर मंजरियाँ जावें झूल। झू

विश्व में ऐसा शीतल खेल

हृदय में जलन रहे, क्या हात!

स्नेह से जलती ज्वाला झेल

बना ली हाँ, होली की रात॥

केशर की कलि की पिचकारी / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

केशर की, कलि की पिचकारीः

पात-पात की गात सँवारी ।

राग-पराग-कपोल किए हैं,

लाल-गुलाल अमोल लिए हैं

तरू-तरू के तन खोल दिए हैं,

आरती जोत-उदोत उतारी-

गन्ध-पवन की धूप धवारी ।

गाए खग-कुल-कण्ठ गीत शत,

संग मृदंग तरंग-तीर-हत

भजन-मनोरंजन-रत अविरत,

राग-राग को फलित किया री-

विकल-अंग कल गगन विहारी ।

होली- मैथिलीशरण गुप्त

जो कुछ होनी थी, सब होली!

धूल उड़ी या रंग उड़ा है,

हाथ रही अब कोरी झोली।

आँखों में सरसों फूली है,

सजी टेसुओं की है टोली।

पीली पड़ी अपत, भारत-भू,

फिर भी नहीं तनिक तू डोली!

केशर की कलि की पिचकारी

इनपुट-लेखकों की कविताओं की पुस्तक

होली- हरिवंशराय बच्चन

यह मिट्टी की चतुराई है,

रूप अलग औ’ रंग अलग,

भाव, विचार, तरंग अलग हैं,

ढाल अलग है ढंग अलग,

आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!

निकट हुए तो बनो निकटतर

और निकटतम भी जाओ,

रूढ़ि-रीति के और नीति के

शासन से मत घबराओ,

आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!

प्रेम चिरंतन मूल जगत का,

वैर-घृणा भूलें क्षण की,

भूल-चूक लेनी-देनी में

सदा सफलता जीवन की,

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,

भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

TNN Lifestyle Desk
TNN लाइफस्टाइल डेस्क author

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