भारत में जब भी शादियों का जिक्र आता है आंखों के सामने सबसे पहले बैंड-बाजे का शोर, नाचते-गाते बाराती और रंग बिरंगी सजावट का मंजर उभरता है। भारतीय शादी का सबसे भावुक पल होता है दुल्हन की विदाई। विदाई वह पल होता है जब किसी पिता की लाडली, किसी मां की आंखों का तारा या किसी भाई की मुस्कान अपना घर आंगन छोड़ किसी और घर को संवारने निकलती है। एक दौर था जब शादी के इस सबसे भावुक पल की साथी हुआ करती थी विदाई की डोली।

डोली में विदा होती थी बेटी (Photo: Freepik)
डोली में बैठते ही दुल्हन एक नया रूप ले लेती थी। वह लड़की से औरत और बेटी से बहू बन जाती थी। विदाई के बाद का वो लम्हा जब उसे कंधों पर उठाकर ससुराल की ओर ले जाया जाता था, मानो उसका पूरा बचपन पीछे छूटता चला जाता। डोली भारतीय परिवारों की उस पारंपरिक सोच की भी प्रतीक थी जिसमें बेटी को पराया धन माना गया। लेकिन साथ ही डोली इस बात का भी संकेत है कि उसका सम्मान किसी राजकुमारी की तरह किया जा रहा है। शादियों की ये तस्वीर अब धुंधली पड़ चुकी है। अब ना तो विदाई में डोली नजर आती है और ना ही उसे उठाने वाले कहार। आधुनिकता की चकाचौंध और लग्जरी गाड़ियों ने इस खूबसूरत परंपरा को इतिहास के पन्नों तक सीमित कर दिया।

एक दूसरे के पूरक थे डोली और कहार (Photo: iStock)
क्या होती थी डोली
80 के दशक तक शादी-ब्याह, गौना या विदाई में परंपरागत तौर पर डोली का इस्तेमाल किया जाता था। डोली भी कई तरह की होती थी- डोली, पालकी, खड़खड़िया। पालकी में पुरुष बैठते थे जो दोनों तरफ से खुले और हवादार होते थे। वहीं डोली में सिर्फ दुल्हन ही बैठती थी। डोली चारों तरफ से ढकी होती थी ताकि कोई दुल्हन को ना देख सके। डोली और पालकी को उठाने की जिम्मेदारी होती थी कहारों की। ये कहार अपने मजबूत कंधों पर मीलों तक डोली-पालकी का भार ढोते थे।
मायके से विदा होकर डोली में बैठी दुल्हन जब ससुराल की ओर बढ़ती थी तो गली-चौराहों पर खड़े लोग कौतूहल से उसे देखते। गांव की महिलाएं और बच्चे डोली को रोककर कहारों को पानी पिलाते और अनाज, मिठाई या पैसों की शक्ल में आशीर्वाद देते।

खास दुल्हनों के लिए सजती थी डोली (Photo: iStock)
केंद्रीय विद्यालय के रिटायर्ड प्रिंसिपल 80 वर्षीय डा. शम्भू नाथ सिंह पुराने दिन याद करते हुए बताते हैं कि, 'एक जमाना था जब शादी ब्याह में बारात के वक्त में डोली का अहम रोल माना जाता था। इसके बिना दरवाजा यानी बारात नहीं लगती थी। तब डोली सजने को शादी होने का पर्याय माना जाता था।'
कैसे शुरू हुई शादी में डोली की परंपरा
शादियों में डोली की परंपरा के दो पहलू बताए जाते हैं। पहला पहलू आस्था से जुड़ा है। दरअसल बिहार के मिथिलांचल में डोली परंपरा की शुरुआत त्रेता युग से मानी जाती है। भारतीय पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान राम सीता को ब्याहने मिथिला आए थे। बिहार के सीतामढ़ी दरभंगा जैसे जिलों के लोग मानते हैं कि राम शादी के बाद सीता को डोली में ही जनकपुर से अयोध्या तक ले गए थे। कहा जाता है कि जनकपुर से अयोध्या जाते वक्त सीतामढ़ी के बथनाहा में देवी सीता की डोली रुकी थी। तभी से वहां शादियों में डोली की प्रथा शुरू हुई जो धीरे-धीरे भारतीय शादियों का अहम हिस्सा बन गई।

मधुबनी पेंटिंग में देवी सीता डोली में ससुराल जाते हुए (Photo: Madhubani Art facebook Page))
दूसरा पहलू ऐतिहासिक और सामाजिक है। इतिहासकारों के मुताबिक, शादियों में डोली का चलन सैकड़ों साल पुराना है। बात तब की है जब एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए ना तो साधन थे और ना ही सड़कें। ऐसे में डोली या पालकी ही सहारा हुआ करती थी एक जगह से दूसरी जगह जाने का। शादी की डोली उठाने के लिए कहार होते थे। दो कहार आगे और दो पीछे। डोली को कंधों पर उठाकर चलते थे। थकान होने पर सहयोगी कहार उनकी जगह लेते। इसके बदले उन्हें मेहनताना, नेग और सम्मान मिलता था। बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में कहारों की पहचान और इज्जत डोली से ही जुड़ी होती थी।
कौन थे दुल्हन की डोली उठाने वाले कहार
कहार जाति और पेशा दोनों हुआ करती थी। कहार जाति के लोग मानते हैं कि वो सप्तऋषियों के वंशज हैं और उन्होंने ही चंद्रवंशी राजा निहुष की डोली उठाई थी। कहार डोली-पालकी उठाने को अपनी शान का प्रतीक मानते थे। हालांकि शादियों में इनका काम सिर्फ डोली ढोना ही नहीं था। वे ब्याह की कई रस्मों का हिस्सा भी होते थे। दूल्हे की सगी-संबंधी महिलाएं डोली में बैठकर रस्में निभाती थीं और कहारों को इसके बदले नेग (शगुन) दिया जाता था।

कहार के साथ तय होता था दुल्हन का मायके से ससुराल तक का सफर (Photo: iStock)
फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य और बिहार के रहने वाले अनूप नारायण सिंह बताते हैं कि, 'पटना के गर्दनी बाग और जगदल पुर इलाके में कहारों का एक मोहल्ला है। यह जगह पुराने जमीदारों ने उन्हें दान दी थी। दान की यह जमीन उन्हें डोली या पालकी ढोने के एवज में बख्शीश के तौर पर मिली थी।'
आधुनिकता की चपेट में गुम हुई डोली की परंपरा
70-80 के दशक तक डोली शादियों की पहचान हुआ करती थी, लेकिन इसके बाद आधुनिकता ने इस परंपरा को निगल लिया। दुल्हन की विदाई के लिए लग्जरी गाड़ियों ने डोली की जगह ले ली। दुल्हन बोलेरो, स्कॉर्पियो या होंडा सिटी से ससुराल विदा होने लगी। कहार बेरोजगार होने लगे। धीरे-धीरे ना तो शादी की डोलियां बचीं और ना ही उन्हें ढोने वाले कहार। कहार समाज दो हिस्सों में बंट गया। एक जो अब भी पारंपरिक काम कर रहा है, जैसे शादी समारोहों में हल्की-फुल्की सेवा या बैंड पार्टी में काम और दूसरा जो मेहनत-मजदूरी या छोटे व्यवसायों में लग गया है। कई कहार अब गांवों में खेतिहर मजदूरी करते हैं या छोटे शहरों में रिक्शा चलाते हैं।

अब ना तो डोली बची और ना ही उसे उठाने के लिए कहार (Photo: iStock)
आधुनिकता के साथ समाज की सोच भी बदली। बदलते दौर में डोली उठाने के काम को सामंती और गुलामी का प्रतीक मानने वाली सोच उभरने लगी। खासकर नई पीढ़ी के कहारों ने इसे अपमानजनक समझकर छोड़ दिया। इन्हें समझ में आया कि अगर समय के साथ दौड़ लगानी है तो उन्हें पढ़ना होगा। इस जाति के बहुत से युवाओं ने हाथों में किताब उठाई और नौकरियां पाईं।
क्या पूरी तरह से खत्म हो चुकी है डोली प्रथा
ये कहना गलत होगा कि शादियों से डोली परंपरा पूरी तरह गायब हो चुकी है। कुछ इलाकों में आज भी प्रतीकात्मक रूप से डोली की रस्म निभाई जाती है। खासकर राजस्थान, बुंदेलखंड, यूपी और बिहार के गांवों में विदाई के वक्त दुल्हन को कुछ कदमों तक डोली में बैठाकर ले जाया जाता है, ताकि परंपरा जिंदा रह सके।

बीते दिनों की बात हो गई डोली (Photo: iStock)
डोली में विदाई और बॉलीवुड की मेलोडी
शादियों में डोली की परंपरा ने बॉलीवुड को भी अपने रंग में रंगा। कई फिल्मी गीतों में डोली को बेहद खूबसूरती से अल्फाज दिये गए। 1979 में एक फिल्म आई थी- जानी दुश्मन। इस फिल्म का एक गीत था- चलो रे डोली उठाओ कहार, पिया मिलन की रुत आई। यह गाना आज भी लोग सुनते और गुनगुनाते हैं। इस गाने में दुल्हन की विदाई की खुशी और उदासी को खूबसूरती से दिखाया गया।
फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में भी डोली को सुरों में पिरोया गया है। शाहरुख खान और काजोल पर फिल्माया मेहंदी लगा के रखना, डोली सजा के रखना सालों तक लोगों की पहली पसंद था। हालांकि अब फिल्मों में डोली का जिक्र कम हो गया है, क्योंकि गाड़ियों ने इस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया। फिर भी पुराने गाने आज भी शादियों में गूंजते हैं और डोली की याद दिलाते हैं।

फिल्मी गीतों से भी गायब हो रही है डोली (Photo: YRF)
डोली की वापसी: क्या फिर लौटेगी ये पुरानी रीत
आप सोच रहे होंगे कि क्या फिर से शादियों में डोली और कहार की ये खूबसूरत परंपरा लौट सकती है। इसका जवाब हां और ना दोनों है। आज के दौर में डोली और कहार को फिर से चलन में लाना कठिन है, लेकिन प्रतीकात्मक तौर पर उसकी मौजूदगी संभव है। बहुत से लोग अपनी शादी के लिए ट्रेडिशनल वेडिंग थीम का चुनाव करते हैं। ऐसी शादियों में विदाई के लिए डोली भी होती है। भले ये डोली कुछ लोग पारंपरिक शादी की थीम रखते हैं और उसमें डोली को शामिल करते हैं।

मॉडर्न शादी में देसी डोली (Photo: Freepik)
निशिता अग्रवाल दिल्ली में द इवेंट डिजाइनर नाम से वेडिंग प्लानिंग कंपनी की ओनर हैं। वह बताती हैं कि ,'पुराने रीति रिवाजों से शादियों का ट्रेंड फिर से सेट हो रहा है। हाइटेक वेडिंग्स को भी परंपरागत शादियों के रंग में रंगा जा रहा है। इन ट्रेडिशनल वेडिंग थीम्स में दुल्हन की विदाई डोली में कराई जाती है। आज का यूथ उन पुरानी परंपराओं को जीना चाहता है जिसके बारे में वह सिर्फ दादी-नानी के किस्से कहानियों में सुनता आया है। हालांकि इस मॉडर्न दौर में डोली का बड़े पैमाने पर वापस आना व्यवहारिक तौर पर थोड़ा मुश्किल है।'

फिर से लौट पाएगी डोली? (Photo: @nasibwalaphotostudio/insta)
उत्तर प्रदेश में बलिया के मूल निवासी अमृत तिवारी पेशे से पत्रकार हैं। वह मानते हैं कि, 'अगर समाज चाहे तो डोली जैसी परंपराएं फिर से एक नया रूप लेकर लौट सकती हैं। वह कहते हैं कि ये जिम्मेदारी युवाओं के कंधे पर अधिक है। वैसे भी जिस तरह से इंस्टाग्राम रील्स के लिए ही सही पुराने ट्रेडिशन को जीया जा रहा है वो डोली जैसी शानदार चीज की वापसी तो करा ही सकता है।' वहीं डोली उठाने वाले कहारों के लिए अमृत का मानना है कि बतौर समाज हमारे लिए उन्हें सिर्फ अतीत का हिस्सा मानने की बजाय उनके पारंपरिक हुनर को सम्मान देना भी जरूरी है।

जारी है डोली को फिर से जिंदा करने की कोशिश (Photo: @glamourdoll.sg/insta)
..और अंत में
वैसे तो समय के साथ बदलाव का आना लाजमी है। लेकिन जैसे हम पुरखों की संपत्ति या अपनी दादी-नानी के गहनों को संभाल कर रखते हैं वैसा ही हम अपनी परंपराओं के साथ भी कर सकते हैं। शादी के नाम पर आज जब हम डिजाइनर लहंगे और महंगी गाड़ियों की बात करते हैं, तो कभी-कभी उस डोली और कहार को भी याद करना चाहिए जो चुपचाप उस खूबसूरत सफर के साथी हो जाया करते थे, जिसमें एक बेटी किसी के घर की बहू बनती थी। यह मानने में कोई बुराई नहीं है कि शायद डोली उठाए कहार अब शादियों में न दिखे, लेकिन अगर हम चाह लें तो इस परंपरा का सांस्कृतिक महत्व हमारी विरासत का हिस्सा बना रहेगा। जरूरत बस इस बात की है कि हम परंपराओं को सिर्फ फोटो एल्बम में नहीं, अपने दिल में भी जगह दें।
