Dhak in Bengal: पश्चिम बंगाल की पहचान सिर्फ रसगुल्ले, साहित्य या दुर्गा पूजा तक सीमित नहीं है। इस राज्य की असली धड़कन उसकी लोक संस्कृति में बसती है, और उसी संस्कृति की सबसे गूंजती हुई आवाज है - ढाक (Dhak)। जैसे ही दुर्गा पूजा का समय आता है, बंगाल की गलियों, पंडालों और मंदिरों में ढाक की थाप सुनाई देने लगती है। यह सिर्फ संगीत नहीं होता, बल्कि एक ऐसा एहसास होता है जो पूरे माहौल को भक्तिमय और जीवंत बना देता है।
ढाक बजाने वाले कलाकारों को 'ढाकी' कहा जाता है। ये कलाकार अक्सर साधारण ग्रामीण परिवारों से आते हैं लेकिन उनकी कला इतनी असाधारण होती है कि उनकी थाप सुनते ही हर बंगाली के मन में उत्सव का भाव जाग उठता है।
क्या होता है ढाक
ढाक एक बड़ा पारंपरिक ढोल होता है, जिसे लकड़ी के ढांचे और चमड़े की मदद से बनाया जाता है। इसे कंधे पर लटकाकर दो पतली छड़ियों से बजाया जाता है। ढाक की आवाज तेज, गहरी और ऊर्जा से भरपूर होती है।
दुर्गा पूजा के समय पंडाल लगाने वाले अनिमेष घोषाल बताते हैं कि धुनुची नृत्य हो या मां दुर्गा की आरती, हर खास पल में ढाक की थाप माहौल को अलग ही ऊंचाई दे देती है। बंगाल में माना जाता है कि ढाक की आवाज सिर्फ कानों तक नहीं, बल्कि सीधे दिल तक पहुंचती है।
गांवों से निकलकर शहरों तक पहुंचते हैं ढाकी
ढाक बजाने वाले अधिकांश कलाकार पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा, बांकुड़ा, बीरभूम और हुगली जैसे जिलों के गांवों से आते हैं। इनमें से कई परिवार पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं।

दुर्गा पंडालों में खूब सुनाई देता है ढाक
टाइम्स नाउ बांग्ला के संपादक बोधिसत्व भट्टाचार्य बताते हैं कि सालभर खेती या मजदूरी करने वाले ये कलाकार दुर्गा पूजा के कुछ महीने पहले अपने ढाक को तैयार करने में जुट जाते हैं। पूजा शुरू होने से पहले वे कोलकाता और दूसरे शहरों की ओर निकल पड़ते हैं, जहां बड़े-बड़े पूजा पंडाल उन्हें बुलाते हैं।
कई बार पूरा परिवार इस परंपरा से जुड़ा होता है। पिता ढाक बजाते हैं, तो बेटे भी बचपन से उसी कला को सीखने लगते हैं। यह सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि विरासत बन चुकी है।
ढाक कैसे हैं दूसरे ढोल से अलग
ढाक को दूसरे पारंपरिक ढोलों से अलग उसकी गहरी, गूंजदार और दूर तक सुनाई देने वाली आवाज बनाती है। यह आकार में सामान्य ढोल से बड़ा होता है और इसे कंधे पर लटकाकर विशेष लय में बजाया जाता है। ढाक का मुख्य ढांचा आमतौर पर आम, कटहल या नीम की लकड़ी से तैयार किया जाता है, क्योंकि ये लकड़ियां मजबूत होने के साथ ध्वनि को अच्छी गूंज देती हैं। ढाक के अंदर खाली जगह रखी जाती है ताकि आवाज में कंपन और गूंज बनी रहे। कई कलाकार इसे रंगीन कपड़ों, पंखों और पारंपरिक सजावट से भी सजाते हैं, जिससे यह सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं बल्कि बंगाल की लोक संस्कृति का प्रतीक बन जाता है।
ढाक की थाप में छिपी होती हैं भावनाएं
ढाक बजाना सिर्फ ताकत का काम नहीं है। इसमें लय, भाव और समय की गहरी समझ चाहिए। एक अनुभवी ढाकी सिर्फ थाप के जरिए माहौल बदल सकता है। जब मां दुर्गा की प्रतिमा का 'बोधन' होता है, तब ढाक की धुन अलग होती है। विसर्जन के समय वही थाप भावुक हो जाती है। यानी ढाक सिर्फ संगीत नहीं बजाता, बल्कि पूरे उत्सव की भावनाओं को आवाज देता है।
बदलते समय में संघर्ष भी बढ़ा
हालांकि आधुनिक डीजे और तेज इलेक्ट्रॉनिक संगीत के दौर में ढाक कलाकारों की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। कई युवा अब इस परंपरा को अपनाने से हिचकते हैं, क्योंकि इससे स्थायी कमाई नहीं हो पाती।
फिर भी कई ढाकी आज भी अपनी कला को जिंदा रखे हुए हैं। कुछ कलाकारों ने सोशल मीडिया और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए ढाक को नई पहचान दिलाने की कोशिश शुरू की है। अब कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी ढाक की प्रस्तुति होने लगी है।
सिर्फ वाद्य नहीं, बंगाल की पहचान है ढाक
ढाक की थाप सुनते ही बंगाल की मिट्टी, त्योहारों की खुशबू और मां दुर्गा की भक्ति एक साथ महसूस होने लगती है। यही वजह है कि बंगाल में कहा जाता है कि 'ढाक सिर्फ बजाया नहीं जाता, उसे महसूस किया जाता है।'
इन कलाकारों की मेहनत और कला ही हर साल दुर्गा पूजा को भव्य और भावनात्मक बनाती है। इसलिए ढाक और ढाकी सिर्फ लोक कलाकार नहीं, बल्कि बंगाल की जीवित सांस्कृतिक विरासत हैं।
