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Pada Club Culture: घर से पहले 'क्लब' का दरवाजा खटखटाते हैं लोग, जानिए क्या है बंगाल का पाड़ा क्लब कल्चर

West Bengal Pada Club: बंगाल में कहा जाता है कि अगर आपको दुनिया का सबसे सटीक राजनीतिक विश्लेषण चाहिए, तो किसी पाड़ा क्लब के अड्डे में 10 मिनट बैठ जाइए।

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क्या है बंगाल का 'पाड़ा कल्चर'? जहां चाय की एक चुस्की पर बदल दी जाती है दुनिया की राजनीति
Authored by: Suneet Singh
Updated Apr 28, 2026, 17:09 IST
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Pada Club: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections 2026) चल रहे हैं। आम से खास तक हर कोई जानना चाहता है कि इस बार पश्चिम बंगाल की जनता राज्य के सत्ता की चाबी किसके हाथ में सौंपती है। देशभर के पत्रकार वहां के लोगों की नब्ज टटोलने में लगे हुए हैं। पश्चिम बंगाल के लिए कहा जाता है कि उसे गहराई से समझने के लिए वहां की ऊंची इमारतों या सरकारी दफ्तरों को देखना काफी नहीं है। बंगाली मानुष को समझने के लिए आपको उतरना होगा बंगाल की तंग गलियों में।

पश्चिम बंगाल की इन्हीं तंग गलियों में घूमते हुए आपको हर मोड़ पर एक छोटा सा कमरा या इमारत दिखेगी, जिसके बाहर रंग-बिरंगे झंडे, बंगाली महापुरुषों की तस्वीरें और अंदर कैरम या ताश खेलते कुछ लोग नजर आएंगे। इसे बंगाल में 'पाड़ा क्लब' कहा जाता है। कहा जाता है कि यही पाड़ा क्लब काफी हद तक तय कर देते हैं कि चुनावी बाजी किसके पाले में आती है।

पाड़ा क्लब: बंगाल की सामाजिक पहचान (AI Image)

पाड़ा क्लब: बंगाल की सामाजिक पहचान (AI Image)

क्या है पाड़ा क्लब

बंगाली भाषा में 'पाड़ा' कहा जाता है मोहल्ले को। हर पाड़ा का अपना एक क्लब होता है। क्लब को 7-8 लोगों की टीम चलाती है। ये क्लब वहां के लोगों को एक साथ जोड़ते हैं। क्लब में मोहल्ले वाले मिलते हैं, साथ बैठते हैं, सुख-दुख बांटते हैं। यहां जमकर हंसी मजाक और मनोरंजन भी होता है।

सुबह की चाय से लेकर रात की अड्डेबाजी तक, हर वक्त यहां हलचल बनी रहती है। बच्चों के खेल, युवाओं की योजनाएं और बुजुर्गों की सलाह, सब कुछ इसी एक जगह पर सिमट जाता है। ये पाड़ा क्लब लंबे समय से बंगाल के लोगों की डेली लाइफ का अहम हिस्सा बने हुए हैं।

आकाशवाणी में रेडियो अनाउंसर रहीं 61 वर्षीय बुलबुल बिस्वास बताती हैं कि, "इन पाड़ा क्लबों की असली चमक दुर्गा पूजा के दौरान नजर आती है। महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। हर क्लब चाहता है कि उसका पंडाल सबसे अलग और आकर्षक हो। इस दौरान पूरा पाड़ा एक परिवार की तरह काम करता है। इसका श्रेय इन पाड़ा क्लबों को ही जाता है।"

क्या है पाड़ा क्लब का इतिहास

पाड़ा क्लबों का कोई लिखित इतिहास तो नहीं है लेकिन बीबीसी से बात करते मशहूर इतिहासकार नृसिंह प्रसाद भादुड़ी ने बताया कि बंगाल की संस्कृति में पहले क्लब कल्चर था ही नहीं। अंग्रेजों ने ब्रिटिश राज में यहां दो तीन क्लब बनाए थे, जहां ब्रिटिश अफसर्स मिलते और मौज मस्ती करते। बकौल नृसिंह प्रसाद भादुड़ी, अंग्रेजों की देखा देखी बंगाल के कुछ मिडिल क्लास लोगों ने बैठकी शुरू की। ये लोग गांव-देहात में किसी पेड़ के नीचे इकट्ठा होते और तमाम तरह की चीजों पर चर्चा करते। इसे पाड़ो चर्चा कहा जाता था।

पाड़ा क्लब का इतिहास

पाड़ा क्लब का इतिहास

धीरे-धीरे यही बैठकी गांव देहात से होते हुए बंगाल के शहर कस्बों तक भी पहुंच गई। बैठकी ने रूप लिया क्लब का। 1940 से 1970 के बीच हर मोहल्ले में क्लब बनने लगे। देखते देखते ये पाड़ा क्लब बंगाल की पहचान बन गए।

पाड़ा क्लब कल्चर की जान है 'अड्डा'

शाम ढलते ही क्लब के बाहर लकड़ी के बेंच या बरामदे पर मोहल्ले के युवा और बुजुर्ग जुटते हैं। यहां चर्चा का विषय स्थानीय नाली की सफाई से लेकर अमेरिका-ईरान युद्ध और पुतिन की पावर के सीक्रेट्स तक कुछ भी हो सकता है। बंगाल में कहा जाता है कि अगर आपको दुनिया का सबसे सटीक राजनीतिक विश्लेषण चाहिए, तो किसी पाड़ा क्लब के अड्डे में 10 मिनट बैठ जाइए।

फुटबॉल और इमोशन का कॉकटेल

हर पाड़ा क्लब की अपनी एक टीम होती है और उनका अपना एक छोटा सा मैदान। डर्बी मैचों (ईस्ट बंगाल बनाम मोहन बागान) के दौरान इन क्लबों में जो माहौल होता है, वह किसी त्यौहार से कम नहीं। हार-जीत पर होने वाली बहसें और जीतने वाली टीम के समर्थकों द्वारा बांटी जाने वाली मिठाइयां इस भाईचारे को और मजबूत करती हैं।

रिश्तेदार बाद में, पाड़ा क्लब पहले (AI Images)

रिश्तेदार बाद में, पाड़ा क्लब पहले (AI Images)

संकट का 'कॉल सेंटर'

आधी रात को किसी की तबीयत खराब हो, मोहल्ले में किसी की बेटी की शादी हो या कोई प्राकृतिक आपदा आए, क्लब के सदस्य सबसे पहले मोर्चे पर खड़े मिलते हैं। इसी कारण बंगाल में एक कहावत भी बहुत है कि रिश्तेदार बाद में, पाड़ा क्लब पहले। जी हां, अगर आधी रात को मोहल्ले में किसी की तबीयत बिगड़ जाए, तो परिवार से पहले क्लब के लड़के पहुंचते हैं।

किसी भी तरह की सामूहिक सेवा हो या फिर प्राकृतिक आपदा के समय राहत कार्य, ये क्लब अपना पहला कर्तव्य मानते हैं। कोरोना काल के दौरान, इन पाड़ा क्लबों ने कम्युनिटी किचन और ऑक्सीजन सप्लाई के जरिए जो मिसाल पेश की, उसने इस कल्चर की प्रासंगिकता को पूरी मजबूती से साबित किया था।

आननंद बाजार पत्रिका के पूर्व पत्रकार और यूट्यूबर नीतिन सुखीजा का मानना है कि, 'बड़ी-बड़ी हाउसिंग सोसायटियों के बंद दरवाजों के बीच, बंगाल के ये पाड़ा क्लब आज भी सामूहिक जीवन की आखिरी उम्मीद हैं। यह एक ऐसा स्पेस है जो आपको अकेला महसूस नहीं होने देता।'

बंगाली पॉलिटिक्स के असली धुरंधर

पश्चिम बंगाल की सत्ता की चाबी इन्हीं पाड़ा क्लबों के पास होती है। राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर मोहल्ले के क्लब का विश्वास जीत लिया, तो पूरे पाड़ा का वोट पक्का है। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति में क्लबों को मिलने वाली सरकारी ग्रांट और उनका राजनीतिक झुकाव हमेशा चर्चा का विषय रहता है।

क्या पाड़ा क्लब के हाथ में होती है सत्ता की चाबी (AI Image)

क्या पाड़ा क्लब के हाथ में होती है सत्ता की चाबी (AI Image)

अब कितना बदल गया पाड़ा कल्चर

समय के साथ पाड़ा क्लब कल्चर में भी बहुत से बदलाव हुए हैं। टाइम्स नॉऊ बांग्ला के एडिटर बोधिसत्व भट्टाचार्य बताते हैं - अब बंगाल जो है वह बंगाली बुजुर्गों का ओल्ड एज होम बनकर रह गया है। बड़ी संख्या में युवा काम-धंधे की तलाश में दूसरे बड़े शहरों में जा बसे हैं। जो बचे भी हैं वो मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में इतने ज्यादा उलझ चुके हैं कि पाड़ा क्लब में बैठकर भी मोबाइल ही चलाते हैं। हालांकि बोधिसत्व भट्टाचार्य यह भी कहते हैं कि भले ये पाड़ा क्लबों में अब लोगों की भीड़ उतनी ना दिखती हो लेकिन हर बंगाली के दिल में इस पाड़ा कल्चर की आत्मा आज भी जिंदा है।

बंगालियों की रूह में बसता है पाड़ा (AI Image)

बंगालियों की रूह में बसता है पाड़ा (AI Image)

बंगाल के लोगों का मानना है कि चाहे जो भी हो, जब तक बंगाली है, तब तक इस पाड़ा क्लब की आत्मा जिंदा भी रहेगी। बंगाल के इसी क्लब कल्चर के लिए रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि मजबूत देश की शुरुआत सरकार से नहीं, बल्कि मोहल्ले और समाज से होती है। यही क्लब लोगों को जोड़ने और समाज को मजबूत बनाने का सबसे सशक्त जरिया हैं।

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