शनिवार को जैसे ही साई सुदर्शन के श्रीलंका दौरे से बाहर होने की खबर कन्फर्म हुई, पडिक्कल के लिए खुद को टीम में शामिल करने का सुनहरा मौका था। उन्होंने इस मौके को दोनों हाथों से लिया और श्रीलंका इलेवन के खिलाफ वॉर्म-अप मैच में शतकीय पारी खेल दी। दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक पडिक्कल 143 रन बनाकर नाबाद थे और उन्होंने प्लेइंग इलेवन में अपनी जगह पक्की कर ली थी। श्रीलंका के खिलाफ पहला टेस्ट 15 अगस्त से गाले में खेला जाएगा और इस बात की पूरी संभावना है कि टीम इंडिया के लिए नंबर 3 पर बल्लेबाजी पडिक्कल ही करेंगे।
दो साल बाद करेंगे वापसी
देवदत्त पडिक्कल रेड बॉल क्रिकेट में भारत के लिए दो साल बाद खेलेंगे। लेकिन इसकी शुरुआत उन्होंने बहुत पहले ही कर दी थी। देवदत्त ने लगभग दो साल बाद भारत की सफेद जर्सी में संभावित वापसी की नींव कई घंटों में रखी गई जो उन्होंने कोलंबो जाने से पहले अपने बचपन के कोच मोहम्मद नसीरुद्दीन के साथ बिताए थे। श्रीलंका के खिलाफ श्रृंखला की तैयारी के लिए इन दोनों ने योजना तैयार की जिसके तहत उन्होंने श्रीलंका की पिचों की तरह भरपूर टर्न देने वाली पिचों पर कूकाबुरा गेंदों से खेलना शुरू किया।
नसीरुद्दीन ने पीटीआई से कहा, ’’केएससीए महाराजा ट्रॉफी टी20 के बाद देवदत्त ने मुझसे संपर्क किया। उन्होंने भारत ए की तरफ से श्रीलंका में एक मैच खेला था लेकिन वह टेस्ट की श्रृंखला के लिए और तैयारी करना चाहते थे।’’ इस बाएं हाथ के बल्लेबाज ने श्रीलंका ए के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन करते हुए 67 और 94 रन बनाए। नसीरुद्दीन ने कहा, ’’उस समय उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि उन्हें अंतिम एकादश में जगह मिलेगी या नहीं। वह अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ तैयारी करना चाहते थे जिससे कि मौका मिलने पर वह अच्छा प्रदर्शन कर सकें। इसलिए, हमने सामान्य लाल गेंदों से अभ्यास शुरू किया।’’
उन्होंने कहा, ’’लेकिन फिर हमें अभ्यास में कूकाबुरा गेंदों का उपयोग करने का विचार आया क्योंकि श्रीलंका में टेस्ट मैचों में इनका उपयोग किया जाता है। इसलिए उन्होंने वे गेंदें खरीदीं और हमने उनसे अभ्यास करना शुरू कर दिया।’’ श्रीलंका के घरेलू मैदान पर उनके स्पिनरों को कुंद करना कठिन काम है इसलिए देवदत्त और नसीरुद्दीन ने बेंगलुरु में श्रीलंका जैसी पिच तैयार करने का फैसला किया।
नसीरुद्दीन ने कहा, ’’हमने अभ्यास के लिए अलग-अलग पिचें तैयार कीं क्योंकि वहां उन्हें अधिक स्पिन का सामना करना पड़ेगा। टर्न लेने वाली पिचों के अलावा हमने अलग-अलग तरह के स्पिनरों की भी व्यवस्था की। उन्होंने प्रतिदिन लगभग तीन घंटे अभ्यास किया। श्रीलंका जाने से पहले वह किसी भी चीज को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते थे।’’
