दुनिया में कुछ साज ऐसे होते हैं जो रूह को सुकून देते हैं और कुछ अल्फाज ऐसे होते हैं जो जेहन में हमेशा के लिए घर कर जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसी गजल के बारे में सुना है जिसे 'शापित' कहा जाता हो? जी हां, उर्दू अदब की गलियों में एक ऐसी गजल कैद है जिसे गाने या सुनने से लोग आज भी कतराते हैं।
इस गजल ने चार महान कलाकारों की जिंदगी को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां से वापसी मुमकिन न थी। हाल ही में सोशल मीडिया पर कुछ कंटेंट क्रिएटर्स ने इस पुराने जख्म को फिर से हरा कर दिया है। सवाल वही है: क्या यह गजल वाकई शापित है या यह महज एक दुखदायी इत्तेफाक?
'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या...
इस शेर के साथ एक शायर ने अपनी विदाई का मंजर कलमबंद किया और फिर जो हुआ, उसने इस रचना के इर्द-गिर्द खौफ और आकर्षण की एक ऐसी चादर लपेट दी जिसे आज तक कोई हटा नहीं पाया। एक पत्रकार के तौर पर जब मैं इस कहानी की परतों को खोल हूं, तो इसमें कला, दर्द और नियति का एक अजीबोगरीब ताना-बना नजर आता है।

इब्न-ए-इंशा
जब इब्न-ए-इंशा ने खुद लिखी अपनी विदाई
इस कहानी का आगाज होता है मशहूर शायर इब्न-ए-इंशा से। इंशा जी अपनी फकीराना तबीयत, घुमक्कड़ी और रूमानी शायरी के लिए मशहूर थे। वे एक ऐसे दरवेश थे जो शब्दों से जादू करना जानते थे। लेकिन सत्तर के दशक में उन्होंने एक ऐसी गजल लिखी जो उनके पिछले तमाम कलामों से बिल्कुल जुदा थी।
इसमें एक अजीब सी बेबसी और दुनिया से रुखसत होने की ऐसी तड़प थी, जैसे कोई मुसाफिर अपना बोरिया-बिस्तर समेटने की जल्दी में हो। कहा जाता है कि जब इंशा जी ने यह गजल लिखी, तो उन्हें खुद भी इस बात का इल्म नहीं था कि वे अपनी ही मौत का परवाना कलमबंद कर रहे हैं। उर्दू अदब में इसे मर्ज-उल-मौत (वह बीमारी जो मौत का कारण बने) के दौरान लिखी गई कैफियत माना जाता है।
गजल मुकम्मल होने के कुछ ही समय बाद उनकी तबीयत नासाज रहने लगी। सर्द हवाओं वाले लंदन के एक अस्पताल में जब वे अपनी सांसों से जद्दोजहद कर रहे थे, तब शायद उन्हें एहसास हुआ होगा कि उनके लिखे शब्द हकीकत की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं। 11 जनवरी 1978 को इंशा जी ने वाकई 'कूच' कर लिया। ऐसा लगा जैसे शायर को अपनी मौत का पूर्वाभास हो गया था और उन्होंने अपनी विदाई की दास्तान पहले ही कागज पर उतार दी थी।

उस्ताद अमानत अली खान
उस्ताद अमानत अली खान: वो आवाज जिसे मौत ने खामोश कर दिया
इंशा जी की इस गजल को जो शोहरत और मुकाम मिला, उसका सबसे बड़ा सेहरा पटियाला घराने के बेताज बादशाह उस्ताद अमानत अली खान के सिर बंधता है। उस्ताद अमानत अली खान की आवाज में जो ठहराव और मखमली भारीपन था, उसने जब 'इंशा जी उठो अब कूच करो' के लफ्जों को छुआ, तो जैसे शब्दों को रूह मिल गई। रेडियो पाकिस्तान के स्टूडियो में जब इसे रिकॉर्ड किया गया, तो सुनने वालों को लगा कि दर्द को आवाज मिल गई है।
असली रहस्य यहीं से गहराना शुरू हुआ और गजल के साथ 'शापित' होने का टैग जुड़ गया। साल 1974 में, इस गजल को पहली बार एक महफिल में गाने के चंद हफ्तों के भीतर ही उस्ताद अमानत अली खान का अचानक इंतकाल हो गया। वे उस वक्त अपनी कामयाबी के चरम पर थे और उनकी उम्र भी बहुत कम थी। संगीत की दुनिया सन्न रह गई। गलियारों में यह बात फैल गई कि उस्ताद ने इस गजल को इतनी शिद्दत और दर्द से गाया कि शायद मौत का फरिश्ता इसे उनकी आखिरी पुकार समझ बैठा। यह एक ऐसी आवाज थी जिसे नियति ने शायद बहुत जल्दी खामोश कर दिया और यहीं से इस गजल को लेकर एक अनजाना खौफ पैदा होने लगा।
असद अमानत अली खान और फिर वही खौफनाक मंजर
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उस्ताद अमानत अली खान की मौत के बाद उनके बेटे असद अमानत अली खान ने अपने पिता की महान विरासत को आगे बढ़ाया। असद की आवाज में भी वही कशिश और पटियाला घराने की वो रवायत मौजूद थी। दिलचस्प बात यह है कि असद ने बरसों तक इस गजल को गाने से परहेज किया। उनके परिवार और चाहने वालों के मन में एक अनकहा डर बैठा था। वही डर जिसने उनके पिता को उनसे छीन लिया था।

असद अमानत अली खान
मगर एक फनकार अपनी सबसे बड़ी पहचान से कब तक महरूम रह सकता है? सुनने वाले कद्रदानों की लगातार गुजारिश और अपने वालिद को खिराज-ए-अकीदत यानी कि श्रद्धांजलि देने की चाह में आखिरकार असद ने भी इस गजल को अपनी आवाज दी। उन्होंने इसे कई बड़े मंचों पर गाया और हर बार सुनने वालों की आंखें भर आईं। लेकिन नियति का क्रूर मजाक देखिए, इतिहास ने खुद को दोहराया। 2007 में असद अमानत अली खान का भी अचानक निधन हो गया।
परिवार के लिए मनहूस साबित हुई गजल
पिता और पुत्र की मौत के बीच की इस अजीब और खौफनाक समानता ने दुनिया को हिला कर रख दिया। दोनों ने इस गजल को अपनी सबसे यादगार प्रस्तुति बनाया और दोनों ही कम उम्र में रुखसत हो गए। इस वाकये ने उन चर्चाओं को आग दे दी कि 'इंशा जी उठो..' कोई साधारण गजल नहीं है। यह एक रूहानी श्राप है।
इसी परिवार के शफकत अमानत अली खान आज संगीत की दुनिया का बड़ा नाम हैं। वो कई बार बता चुके हैं कि इस गजल को उनके सबसे बड़े भाई अमजद अली खान ने भी गाया और उनका इंतकाल हो गया। इस गजल को रिकॉर्ड करने वाले प्रोड्यूसर भी नहीं रहे।
शफकत देश दुनिया में घूम-घूम कर शो करते हैं लेकिन कभी इस गजल को नहीं छूते। वो कहते हैं कि, 'मैं अंधविश्वास को बिल्कुल नहीं मानता। मौत और जिंदगी तो ऊपरवाले के हाथ में है, लेकिन घरवालों ने इल्तजा की है कि इस गजल को मत गाना।' शफकत ने हमेशा उस इल्तजा का लिहाज रखा। दूसरे बड़े गायक भी इस गजल को गाने से बचते रहे हैं।

शफकत अमानत अली खान (Photo: फेसबुक)
आखिर क्या कहती है ये गजल
सोचिए जो गजल पिछले 50 सालों से जिंदा है उसे लिखने और गाने वाले सब बेवक्त मौत का निवाला बन गए। इस गजल की गहराई और इसके पीछे के 'श्राप' के तर्क को समझने के लिए इसके अल्फाजों को समझना जरूरी है।
'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या
इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही
जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली का फैलाना क्या
शब बीती चांद भी डूब चला ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में
क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या
फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो यही एक घड़ी
जो दिल में है लब पर आने दो शर्माना क्या घबराना क्या
उस रोज़ जो उन को देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है
उस रोज़ जो उन से बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या
उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें
जिसे देख सकें पर छू न सकें वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या
जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूं बन में न जा बिसराम करे
दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्या
इस गजल में शायर इब्न-ए-इंशा खुद से कह रहे हैं कि अब यहां से प्रस्थान करने का समय आ गया है। इस दुनिया की मोह-माया में पड़ना व्यर्थ है, क्योंकि अब तो अपना घर भी पराया महसूस होने लगा है। जब समाज और दुनिया आपकी कद्र न करे या आपके लिए दरवाजे बंद कर दे, तो वहां जबरदस्ती ठहरकर खुद को तकलीफ पहुंचाने से बेहतर है कि अपना अलग रास्ता चुन लिया जाए।
वह आगे कहते हैं कि सुख अब खत्म हो चुका है। अब धूप यानी हकीकत की तल्खी और मौत की सच्चाई का सामना करना ही होगा। पुरानी खुशियों को याद करना अब सिर्फ तड़प ही बढ़ाएगा। जिंदगी की भागदौड़ और दुखों ने उन्हें इतना थका दिया है कि अब वह सोने यानी मौत की गोद में जाने के लिए बेताब है। वह इस दुनिया की कश्मकश से पूरी तरह थक चुके हैं।
श्राप या इत्तेफाक?
संगीत और साहित्य पर गहरी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार नितिन सुखीजा से हमने इस गजल के वाबस्ता बात की। उन्होंने हमें बताया कि एक विश्लेषक के तौर पर जब मैं इस 'शापित गजल' वाली थ्योरी को देखता हूं, तो इसके दो पहलू नजर आते हैं। पहला पहलू वैज्ञानिक और तार्किक है। इब्न-ए-इंशा की मृत्यु लंदन में इलाज के दौरान हुई, जिसे चिकित्सकीय आधार पर समझाया जा सकता है। उस्ताद अमानत अली और उनके बेटे असद की मौत के पीछे भी स्वास्थ्य संबंधी कारण थे।
दूसरा पहलू 'ट्रैजेडी के रोमांस' का है। उर्दू साहित्य में 'बर्बादी' और 'गम' को एक ऊंचे दर्जे की कला माना गया है। जब कोई कलाकार किसी ऐसी रचना को गाता है जो सीधे तौर पर मौत और विदाई की बात करती है, तो वह मनोवैज्ञानिक रूप से उस अवसाद की गहराइयों में उतर जाता है। मुमकिन है कि बार-बार इन्हें दोहराने और उस गहरे दुख को जीने का असर इन कलाकारों के दिल और दिमाग पर पड़ा हो।
उर्दू शायरी में सुखन यानी शब्दों की अपनी तासीर होती है। जब आप बार-बार 'कूच करो' जैसे अल्फाज दोहराते हैं, तो वह आपके अवचेतन मन का हिस्सा बन जाते हैं।
क्या यह वाकई कोई श्राप है? शायद नहीं। लेकिन क्या यह महज एक इत्तेफाक है? जिस तरह से इन सभी मौतों का पैटर्न मिलता है, उसे देखते हुए तर्क भी थोड़े कमजोर पड़ जाते हैं। हम इसे 'कलेक्टिव सबकॉन्शियस' का असर भी कह सकते हैं, जहां एक रचना के साथ जुड़ी कहानियां कलाकारों के मानसिक दबाव को बढ़ा देती हैं।
'इंशा जी उठो अब कूच करो' को दुनिया चाहे शापित, मनहूस या अभागी गजल माने, यह आज भी उर्दू अदब का एक अनमोल हीरा है। यह गजल शापित है या नहीं, यह बहस शायद कभी खत्म न हो, लेकिन इसका हर शेर अमर है। आखिरकार, हम सब इस दुनिया में मुसाफिर ही तो हैं, जिन्हें एक दिन सामान समेट कर यहां से रुखसत हो जाना है।
