भारतीय समाज में बेटे की चाहत एक ऐसा नासूर रही है, जिसने न जाने कितनी सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों को जन्म दिया। कभी यह चाहत झाड़-फूंक और तांत्रिकों के चक्कर काटती दिखी, तो कभी लिंग परीक्षण जैसी गैर-कानूनी तकनीकों के दरवाजे पर खड़ी मिली। एक दौर था जब दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ियों और निचले आय वर्ग के इलाकों में एक ऐसा अंधविश्वास फैला, जिसने इंसानियत, कानून और मातृत्व तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया। यह अंधविश्वास था- एशिया की सबसे बड़ी जेल, दिल्ली की 'तिहाड़ जेल' में बच्चे को जन्म देने से बेटे की प्राप्ति होती है।
फैला था अंधविश्वास
तिहाड़ जेल के पूर्व सुप्रीटेंडेंट सुनील गुप्ता ने एक पोडकास्ट में बताया कि साल 2010 के करीब दिल्ली में ऐसा अंधविश्वास फैल गया था कि जेल में अगर बच्चे का जन्म हो तो ज्यादा संभावना है कि लड़का होगा। मान्यता यह गढ़ी गई कि जेल का दंड भुगतने से महिला के सारे 'पाप' धुल जाते हैं और ईश्वर प्रसन्न होकर उसे पुत्र रत्न का वरदान देता है। इस खोखले अंधविश्वास के चलते कई महिलाओं ने सिर्फ इसलिए अपराध की दुनिया में कदम रखा ताकि वे गर्भवती होने के दौरान तिहाड़ पहुंच सकें।
बेटे की चाहत में चोर बन गई मां
जनकपुरी की एक झुग्गी में रहने वाली 39 वर्षीया महिला की कहानी इस अंधविश्वास का सबसे दर्दनाक उदाहरण है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पहले से ही पांच बेटियों की मां, यह महिला अपने छठी बार गर्भवती होने पर घोर सामाजिक दबाव और डर के साये में थी। समाज के ताने, आर्थिक तंगी और फिर से बेटी होने का खौफ उसे रात भर सोने नहीं देता था। उसने आस-पास के इलाके में तिहाड़ जेल से जुड़ी इस मनगढ़ंत कहानी के बारे में सुन रखा था।
जब वह चार महीने की गर्भवती थी, तब उसने एक दुस्साहसिक कदम उठाया। उसने अपनी मालकिन के घर से सोने की चूड़ियां और 5,000 रुपये नकद चुरा लिए। यह चोरी उसने खुद को पुलिस के हवाले कराने के लिए की थी। उसने मौके पर ही ऐसे सुराग छोड़े जिससे पुलिस उस तक आसानी से पहुंच सके।

छोटे-मोटे अपराध कर जेल जाने लगीं थीं औरतें
अदालत ने उसे दोषी ठहराया और चार महीने की सजा सुनाकर तिहाड़ भेज दिया। महिला को लगा कि उसका मकसद पूरा हो गया। उसे विश्वास था कि उसके पाप धुल चुके हैं और इस बार ईश्वर उसे बेटा ही देगा। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। उसकी चार महीने की सजा डिलीवरी की संभावित तारीख से एक महीना पहले ही खत्म हो गई और उसे जेल से रिहा कर दिया गया। रिहाई के कुछ हफ्तों बाद जब उसने बच्चे को जन्म दिया, तो वह एक बार फिर बेटी ही थी।
जेल से रिहाई के बाद उस महिला ने जो कहा वो समाज के काले सच को बयां करते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए उसने कहा था- मुझे चोरी करने की जरूरत नहीं थी, लेकिन बेटियां पालना गरीब के लिए बेहद खर्चीला काम है। आखिर में उन्हें दूसरे के घर जाना होता है। बेटा होता तो कम से कम बुढ़ापे में सहारा बनता। मैंने कई महिलाओं को तिहाड़ जाकर बेटा पाते देखा था, शायद मेरी ही किस्मत में यह नहीं था।
जेल प्रशासन के उड़ गए थे होश
ये कोई अकेला मामला नहीं था। बेटे की चाहत में गरीब औरतें चोरी, शराब की तस्करी या फिर लड़ाई झगड़े के केस में खुद को गिरफ्तार कराने लगीं। तिहाड़ में ऐसे मामलों में तेजी से उछाल दिखने लगा। जो आंकड़ा हर साल औसतन 20-25 डिलीवरी के मामले होते थे वो बढ़ते-बढ़ते साल 2013 तक 70-75 पहुंच गए।
तिहाड़ जेल के अंदर प्रेंग्नेंट कैदियों के आंकड़े ने प्रशासन के भी होश उड़ा दिए थे। साल 2014 में तो तिहाड़ के अंदर 120 गर्भवती महिला कैदी थीं, जिनमें से 120 बच्चों का जन्म हुआ। हालांकि, वास्तविकता अंधविश्वास के बिल्कुल उलट थी। उन 120 नवजात शिशुओं में 82 लड़कियां थीं और केवल 38 लड़के।
लगातार बढ़ते आंकड़ों और गर्भवती महिलाओं के छोटे-मोटे अपराधों में जानबूझकर शामिल होने की घटनाओं को देखकर तिहाड़ जेल प्रशासन हरकत में आया। 23 जनवरी 2015 को, तिहाड़ जेल प्रशासन ने एक अनोखा सर्कुलर जारी किया। इस सर्कुलर का मकसद जेल में बंद और बाहर रहने वाली महिलाओं के दिमाग से इस अंधविश्वास को खत्म करना था।
सर्कुलर में क्या लिखा था
“सभी बंदियों को सूचित किया जाता है कि पिछले वर्ष जेल में 120 बच्चों का जन्म हुआ, जिनमें से 82 लड़कियां और केवल 38 लड़के थे। लड़कियां किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं हैं और बच्चे ईश्वर का उपहार होते हैं। कृपया इस आधार पर भेदभाव न करें।”
जेल प्रशासन ने न केवल जेल के अंदर, दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में भी ऐसे पोस्टर लगवाए और जागरूकता अभियान चलाए। अखबारों के जरिए भी इस मिथक को तोड़ने का खूब प्रयास किया गया।

तिहाड़ जेल प्रशासन को जारी करना पड़ा था सर्कुलर
गरीबी, हिंसा और सामाजिक दबाव का त्रिकोण
ग्रेटर नोएडा के गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर अर्चना सिंह उन दिनों जेएनयू से रिसर्च कर रही थीं। उन्होंने उस दौर को याद करते हुए कहा कि तिहाड़ जेल से जुड़ा यह अंधविश्वास केवल अज्ञानता या अंधविश्वस का नतीजा नहीं था। यह उस गहरे सामाजिक दबाव और पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम भी था, जो भारत के बड़े शहरों की मलिन बस्तियों में फैली हुई है।
प्रोफेसर अर्चना के अनुसार, कई गरीब महिलाएं तिहाड़ जेल जाने के लिए सिर्फ इसलिए भी उत्सुक रहती थीं क्योंकि वहां कम से कम उन्हें अपने शराबी या हिंसक पतियों की मारपीट से सुरक्षा मिलती थी और गर्भावस्था के दौरान समय पर मुफ्त खाना और चिकित्सीय देखभाल मिल जाती थी।
उन दिनों की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सौम्या (काल्पनिक नाम) नाम की लड़की पर उसके ससुराल और पति की ओर से बेटा पैदा करने का इतना जबरदस्त मानसिक और शारीरिक दबाव था कि उसने जेल जाने के लिए छोटे-मोटे अपराध करने शुरू कर दिए। उस पर तीन मामले दर्ज हुए, लेकिन हर बार अदालत ने चेतावनी देकर छोड़ दिया।
सौम्या ने तब एक मीडिया हाउस से बात करते हुए कहा था- बेटा पाने का दबाव इतना ज्यादा था कि अगर जेल जाने के लिए मुझे किसी का खून भी करना पड़ता, तो मैं कर देती। हालांकि, सौम्या जेल नहीं पहुंच सकी, लेकिन बाद में उसने एक बेटे को जन्म दिया।
समाज से भी होना चाहिए सवाल
तिहाड़ जेल में बच्चे के जन्म से जुड़ा यह अंधविश्वास भारतीय समाज की उस मानसिकता को नंगा करता है, जहां एक महिला बेटा पैदा करने की हसरत में खुद को अपराधी बनाने तक को तैयार हो जाती है। जब समाज एक बेटी के जन्म को 'बोझ' और बेटे को 'सुरक्षा की गारंटी' मानने लगता है, तो कानून, व्यवस्था और नैतिकता सब पंगु हो जाते हैं।
तिहाड़ जेल से जुड़ी ये घटनाएं उस मानसिक गुलामी की दास्तां भी बयां करती हैं जिससे हमारा समाज आज भी जूझ रहा है। जेल प्रशासन द्वारा पोस्टर छापने और सर्कुलर जारी करने से कानून तो संभल सकता है, लेकिन जब तक बेटियों को बराबरी का दर्जा और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक अंधविश्वास के ऐसे नए-नए रूप समाज को डराते रहेंगे।
