घर में बच्चे और माता-पिता हर बात पर एक जैसा सोचें, ऐसा जरूरी नहीं है। बच्चे बड़े होते हैं तो उनकी अपनी पसंद, सवाल और राय बनने लगती है। ऐसे में कभी-कभी उनका मम्मी-पापा की बात से असहमत होना या बहस करना स्वाभाविक है। लेकिन हमारे घरों में अक्सर बहस को तुरंत बदतमीजी, जिद या अनुशासन की कमी मान लिया जाता है।
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अभिनेत्री तारा सुतारिया ने हाल की बातचीत में अपने बचपन का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके माता-पिता उनकी और उनकी बहन की राय को महत्व देते थे और उन्हें असहमति जताने की जगह मिलती थी। तारा के मुताबिक, घर में अपनी बात रखने की आजादी ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में मदद की। यह बात सिर्फ सेलिब्रिटी की परवरिश तक सीमित नहीं है। बच्चों के लिए घर ऐसा स्थान होना चाहिए जहां वे सवाल पूछ सकें, अपनी बात कह सकें और जरूरत पड़ने पर सम्मान के साथ कह सकें कि वे माता-पिता से अलग सोचते हैं।
हर बहस बदतमीजी नहीं
जब बच्चा कहता है, मैं ऐसा नहीं सोचता या मुझे यह ठीक नहीं लगता, तो जरूरी नहीं कि वह माता-पिता का अपमान कर रहा हो। हो सकता है वह अपनी समझ के हिसाब से कोई बात सामने रखना चाहता हो।
बच्चे की बात सुनने का मतलब यह नहीं कि उसकी हर बात मान ली जाए। असली बात यह है कि उसे अपनी राय रखने का मौका मिले। इससे वह धीरे-धीरे समझता है कि बातचीत सिर्फ अपनी बात मनवाने का नाम नहीं है।
तारा सुतारिया ने बताई अपने परिवार की बात
तारा ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए कहा कि उनके माता-पिता उन्हें और उनकी बहन को बराबरी का सम्मान देते थे। उनकी राय को महत्व दिया जाता था और परिवार में अलग राय रखने की गुंजाइश थी। उनके अनुसार, इस तरह का माहौल बच्चे में आत्मविश्वास और अपने व्यक्तित्व को समझने की क्षमता बढ़ा सकता है।
बहस हो.. मगर सम्मान के साथ
हेल्दी आर्ग्युमेंट या बहस तो स्वस्थ असहमति का मतलब चिल्लाना, गुस्सा करना या सामने वाले को नीचा दिखाना नहीं है। माता-पिता बच्चों को सिखा सकते हैं कि अपनी बात मजबूत तरीके से रखो, लेकिन शब्दों में सम्मान बनाए रखो।
पेरेंट्स के लिए सलाह
कई बार बच्चे की बहस से ज्यादा जरूरी माता-पिता की प्रतिक्रिया होती है। अगर हर सवाल का जवाब डांट है, तो बच्चा धीरे-धीरे सवाल पूछना बंद कर सकता है। वहीं अगर हर बात पर पूरी आजादी दे दी जाए, तो जरूरी सीमाएं कमजोर हो सकती हैं।
इसलिए बीच का रास्ता बेहतर है। बच्चे की बात सुनें, अपना कारण समझाएं और जहां जरूरत हो वहां साफ सीमा भी तय करें। हाल की विशेषज्ञ टिप्पणियों में भी बच्चों को सुना जाना जरूरी बताया गया है, साथ ही उम्र के अनुसार माता-पिता की भूमिका और स्पष्ट सीमाओं को बनाए रखना महत्वपूर्ण माना गया है।
