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आशा भोसले के निधन से फिर खनका बरेली का झुमका, बाजार में टूट पड़े हैं लोग

Bareily Ka Jhumka: पर्यटन विभाग का कहना है कि आशा भोसले का यह गीत आज भी बरेली की सबसे मजबूत सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है। इसी वजह से बरेली को “झुमका सिटी” के नाम से भी जाना जाता है।

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आशा भोसले और बरेली का झुमका (Photo: isTock/instagram)

Bareily Ka Jhumka: देश दुनिया में अपने सुरों से ख्याति अर्जित करने वालीं आशा भोसले के निधन ने एक बार फिर बरेली के मशहूर झुमके को सुर्खियों में ला दिया है। खासतौर पर युवाओं के बीच इस पारंपरिक आभूषण की मांग अचानक बढ़ गई है। दरअसल 19 अप्रैल को पड़ने वाले अक्षय तृतीया से पहले झुमकों की खरीदारी बहुत तेज हो गई है।

आशा भोसले, जिन्होंने सात दशकों से भी लंबे करियर में 12,000 से अधिक गाने गाए, का 12 अप्रैल को मुंबई के एक निजी अस्पताल में 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके जाने के बाद उनके मशहूर गीत “झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में” की लोकप्रियता फिर से चर्चा में आ गई है।

बरेली के ज्वैलर्स के अनुसार, अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर महिलाएं झुमके खरीदने के लिए बाजार का रुख कर रही हैं। आर्टिफिशियल ज्वैलरी के व्यापारियों ने बढ़ती मांग को देखते हुए दिल्ली के थोक विक्रेताओं से झुमकों का नया स्टॉक मंगवाना शुरू कर दिया है।

इस बढ़ती दिलचस्पी की वजह 1966 की फिल्म मेरा साया का वह आइकॉनिक गीत है, जिसे मदन मोहन ने संगीत दिया था और जिस पर अभिनेत्री साधना को फिल्माया गया था। 'झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में' ने बरेली को एक खास सांस्कृतिक पहचान दी और इसके ज्वैलरी बाजार को देश-विदेश में प्रसिद्ध कर दिया।

पर्यटन विभाग के उपनिदेशक रविंद्र कुमार का कहना है कि यह गीत आज भी बरेली की सबसे मजबूत सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है। इसी वजह से बरेली को “झुमका सिटी” के नाम से भी जाना जाता है।

समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए रविंद्र कुमार ने बताया कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक अकसर बरेली के झुमके की कहानी और उससे जुड़े इतिहास के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर झुमका कहां गिरा था और इसके पीछे की कहानी क्या है।

बरेली के स्थानीय ज्वैलर राज कुमार खंडेलवाल के मुताबिक, आशा भोसले के निधन के बाद देशभर के व्यापारियों ने झुमका डिजाइनों में खास रुचि दिखाई है। यहां तक कि अन्य व्यवसायों से जुड़े लोग भी इन डिजाइनों के बारे में जानकारी ले रहे हैं।

इज्जतनगर स्थित रेल कैफे चलाने वाले संजीव कुमार “सोनू” ने पीटाई को बताया कि उनके यहां आने वाले यात्री अकसर झुमका बाजार के बारे में पूछते हैं। वहीं, एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत प्रतिक्षा हर्षित खंडेलवाल ने बताया कि उनकी बेंगलुरु में रहने वाली दोस्त ने हाल ही में यह गीत सुना और जन्मदिन पर बरेली का झुमका गिफ्ट करने की इच्छा जताई।

शहर की प्रोफेसर डॉ. अर्चना सिंह के अनुसार, झुमका सेट उपहार के रूप में काफी लोकप्रिय हैं और जब वह इन्हें बरेली के बाहर शादियों में देती हैं, तो लोग इसे बहुत पसंद करते हैं।

बरेली महानगर बुलियन एसोसिएशन के अध्यक्ष संजीव अग्रवाल का कहना है कि 12 अप्रैल के बाद से झुमकों की मांग में अचानक बढ़ोतरी देखी गई है, खासकर अक्षय तृतीया के चलते खरीदारी और बढ़ गई है।

बरेली के बाजारों में पारंपरिक मीनाकारी और कांच-चेन वाले झुमकों से लेकर सोना, हीरा, कुंदन और पोल्की के आधुनिक डिजाइन तक उपलब्ध हैं। आर्टिफिशियल ज्वैलरी की कीमत 50 रुपये से 20,000 रुपये तक होती है, जबकि सोने के झुमके बाजार भाव के अनुसार बिकते हैं।

व्यापारियों का कहना है कि बरेली का झुमका व्यापार आज भी काफी हद तक आशा भोसले के इस मशहूर गीत की वजह से जीवित है, जिसने दशकों बाद भी शहर की सांस्कृतिक पहचान और व्यापार दोनों को बनाए रखा है।

इनपुट: PTI

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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