Ae Mere Watan Ke logon Song Trivia: देश इस साल अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। 15 अगस्त वह तारीख है जब हिंदुस्तान ने अंग्रेजों के गुलामी की बेड़ियों को तोड़ फेंका था। देश की आजादी के लिए कई मां भारती के कई वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। जब भी देश के लिए शहीद होने वाले जांबाज सिपाहियों की शहादत की बात आती है तो एक गीत जेहन में जरूर गूंजता है। यह गीत है - ऐ मेरे वतन के लोगों। यह गीत यूं तो 1962 में भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए बना था, लेकिन समय के साथ यह देशभक्ति का प्रतीक बन गया। यह गीत आज भी सुनने वालों को रुला देता है। यह गीत जितना ज्यादा मार्मिक है उतनी दिलचस्प इसके बनने की कहानी है।
किसने रचा था ऐ मेरे वतन के लोगों..?
सबसे पहले तो बता दें कि ऐ मेरे वतन के लोगों को लिखा था कवि प्रदीप ने। सुरों से सजाया था सी रामचंद्रन ने और इस कालजयी गीत को अपनी आवाज से हमेशा के लिए अमर किया लता मंगेशकर ने। यह गीत किसी फिल्म के लिए नहीं बल्कि तत्कालीन भारत सरकार की डिमांड पर बना था। पहली बार इस गीत को 27 जनवरी, 1963 में लाइव शो में गाया गया था।
कैसे बना था Ae Mere Watan ke logo
कवि प्रदीप ने एक इंटरव्यू में बताया था कि यह गाना कैसे बना। बात 1962 की है। भारत चीन से युद्ध में हार गया था। पूरे देश का मनोबल डाउन था। इसी माहौल में कवि प्रदीप एक शाम मुंबई में समुंदर किनारे टहल रहे थे। तभी उनके दिमाग में कुछ ऐसा सूझा कि उन्होंने उसे कागज पर उतारना चाहा। लेकिन तब ना तो उनके पास कलम थी और ना ही कागज। प्रदीप ने वहीं टहल रहे एक शख्स से कलम मांगी और अपनी जेब से सिगरेट का डिब्बा निकाल लिया। सिगरेट के पैकेट में जो फॉयल होता है उसे निकाला और उस पर कुछ लाइनें लिख लीं ताकि वह भूल ना जाएं।
कुछ दिनों बाद भारत सरकार की तरफ से दिल्ली में एक चैरिटी शो रखा गया। आयोजकों ने फिल्म वालों से कहा कि कुछ ऐसा गाना बनाएं कि सुनने वाले हार की गम भूल जाएं। बात प्रदीप तक पहुंची। उनसे भी कहा गया कि आप कोई जोश से भरा देशभक्ति गीत लिख दीजिए। उनके आग्रह पर प्रदीप ने उन्हीं चंद लाइनों से पूरा गीता बना लिया जो उन्होंने समुंदर किनारे टहलते हुए लिखी थी। गीत का मुखड़ा था- ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी। तो यूं बना था देशभक्ति का यह कालजयी गाना।
बता दें कि जब पहली बार यह गीत दिल्ली में लोगों के बीच लता मंगेशकर ने गाया तो वहां मौजूद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की आंखें भी नम हो गई थीं।
