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क्या है स्पेस कैप्सूल, जो लैंडिंग के समय बन जाता है आग का गोला; Artemis 2 से समझें इसकी पूरी साइंस

NASA के Artemis II मिशन की सफलता के बाद Space Capsule (Orion) की चर्चा है, लेकिन इसके काम करने के पीछे का साइंस कम लोगों को पता है। आइए आसान भाषा में समझें कि कैसे एक कैप्सूल लॉन्च होता है, अंतरिक्ष में कैसे काम करता है और फिर पैराशूट के जरिए समंदर में कैसे 'स्प्लैशडाउन' करता है।

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क्या है स्पेस कैप्सूल के काम करने के पीछे की साइंस

Artemis II Space Capsule Science: ब्रह्मांड की असीम गहराइयों को नापने की मानव की लालसा सदियों पुरानी है, लेकिन इस सपने को हकीकत में बदलने का जो विज्ञान है, उसका एक अहम हिस्सा है, स्पेस कैप्सूल। नासा (NASA) के आर्टेमिस 2 (Artemis II) मिशन की शानदार सफलता ने पूरी दुनिया का ध्यान इस तकनीक की ओर खींचा है। शनिवार की सुबह जब ओरियन कैप्सूल चंद्रमा की परिक्रमा कर प्रशांत महासागर में उतरा, तो वह केवल एक यान की वापसी नहीं थी, बल्कि मानव इंजीनियरिंग के सबसे सुरक्षित 'कवच' की जीत थी। आइए, आर्टेमिस 2 के ओरियन कैप्सूल के उदाहरण से समझते हैं कि आखिर यह स्पेस कैप्सूल क्या होता है और यह कैसे काम करता है।

क्या है स्पेस कैप्सूल? (What is Space Capsule in Hindi)

आसान शब्दों में कहें तो स्पेस कैप्सूल अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बना एक 'छोटा, अभेद्य घर' है। एक लंबी दूरी की मिसाइल या रॉकेट के ऊपर लगा वह छोटा सा हिस्सा, जिसमें इंसान बैठकर पृथ्वी के वायुमंडल को पार करते हैं और वापस लौटते हैं, उसे ही कैप्सूल कहा जाता है। आर्टेमिस 2 मिशन में इस 'घर' का नाम ओरियन (Orion) था। इसे इस तरह डिजाइन किया जाता है कि यह अंतरिक्ष के शून्य तापमान, घातक रेडिएशन और लौटते समय वायुमंडल की भीषण रगड़ (Friction) को झेल सके।

स्पेस कैप्सूल की बनावट

आर्टेमिस 2 के ओरियन कैप्सूल को मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है, जो मिलकर एक पूरी 'लाइफ सपोर्ट मशीन' बनाते हैं।

1. पहला है क्रू मॉड्यूल (Crew Module), यह कैप्सूल का वह मुख्य भाग है जहां चारों अंतरिक्ष यात्री रहते हैं। इसका आकार एक कोन जैसा होता है। इसके अंदर हवा का दबाव वैसा ही रखा जाता है जैसा पृथ्वी पर होता है। इसमें अत्याधुनिक कंट्रोल पैनल, सोने की जगह और टॉयलेट की सुविधा होती है।

2. दूसरा हिस्सा है सर्विस मॉड्यूल (Service Module), कैप्सूल के ठीक नीचे लगा यह हिस्सा इसका 'पावरहाउस' है। यह कैप्सूल को बिजली, पानी और ऑक्सीजन की सप्लाई करता है। आर्टेमिस 2 में इसे यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने तैयार किया था। इसमें लगे इंजन ही अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की कक्षा में धकेलते हैं और वापस पृथ्वी की ओर मोड़ते हैं।

3. तीसरा और सबसे खास हिस्सा है हीट शील्ड (Heat Shield), यह कैप्सूल के सबसे निचले हिस्से में लगी एक ढाल होती है। आर्टेमिस 2 जब 40,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से धरती पर लौटा, तो हवा की रगड़ से वहां 2,800 डिग्री सेल्सियस तापमान पैदा हुआ। यह हीट शील्ड ही थी जिसने उस गर्मी को सोख लिया और अंदर बैठे यात्रियों को जलने से बचाया।

Orion eparates from the service module

सर्विस मॉड्यूल से अलग होता Orion (NASA)

    रॉकेट की सवारी और अंतरिक्ष का सफर

    स्पेस कैप्सूल खुद से जमीन से उड़ान नहीं भर सकता। इसे अंतरिक्ष तक पहुंचाने के लिए एक पॉवरफुल रॉकेट की जरूरत होती है। आर्टेमिस 2 को SLS (Space Launch System) रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया था। लॉन्च के शुरुआती 8 मिनट सबसे खतरनाक होते हैं। जब रॉकेट अंतरिक्ष की दहलीज पर पहुंचता है, तो वह कैप्सूल को अलग कर देता है। इसके बाद कैप्सूल का अपना इंजन चालू होता है। आर्टेमिस 2 ने इसी प्रक्रिया के जरिए चंद्रमा की ओर बढ़ा और करीब 10 दिनों तक गहरे अंतरिक्ष की यात्रा की। इस दौरान यात्रियों ने चंद्रमा के 'डार्क साइड' (पिछला हिस्सा) को देखा और पृथ्वी से सबसे अधिक दूरी (2,52,756 मील) तय करने का रिकॉर्ड बनाया।

    The Orion spacecraft splashdown

    स्पैशडाउन से ठीक पहले Orion (NASA)

    री-एंट्री और लैंडिंग

    अंतरिक्ष से वापस आना, अंतरिक्ष में जाने से कहीं अधिक कठिन है। जब आर्टेमिस 2 का सफर पूरा हुआ, तो ओरियन कैप्सूल ने खुद को सर्विस मॉड्यूल से अलग कर लिया। अब केवल वह 'कोन' जैसा हिस्सा ही पृथ्वी की ओर गिर रहा था। जैसे ही कैप्सूल पृथ्वी के वायुमंडल में घुसा, हवा के अणुओं ने उसे धीमा करने की कोशिश की। इस प्रक्रिया में भारी घर्षण पैदा हुआ और कैप्सूल एक जलते हुए आग के गोले में बदल गया। इस इस Fireball Phase को 'ब्लैकआउट' पीरियड भी कहते हैं, क्योंकि इस समय गर्मी इतनी अधिक होती है कि रेडियो सिग्नल तक कट जाते हैं।

    इसमें सबसे जरूरी पैराशूट की भूमिका हो जाती है। जब कैप्सूल की गति काफी कम हो गई, तब सबसे पहले दो छोटे 'ड्रोग पैराशूट' खुले। इसके बाद तीन विशाल मुख्य पैराशूट खुले, जिन्होंने कैप्सूल की गति को 40,000 किमी/घंटा से घटाकर महज 30 किमी/घंटा कर दिया। और फिर आया अंतिम चरण जिसे स्प्लैशडाउन (Splashdown) कहते हैं। 11 अप्रैल की सुबह ठीक 5:37 पर, ओरियन कैप्सूल ने प्रशांत महासागर के पानी में एक 'डाइव' लगाई। पानी एक कुशन की तरह काम करता है, जो झटके को सोख लेता है। इसके तुरंत बाद अमेरिकी नौसेना के जहाज (USS John P. Murtha) ने यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

    Nishant Tiwari
    निशांत तिवारी author

    निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृ... और देखें

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