Science News: आप अगर विज्ञान के छात्र रहे हैं तो 'द्रव्यमान संरक्षण का नियम' तो जरूर सुना होगा। द्रव्यमान संरक्षण का नियम या लॉ ऑफ कंजर्वेशन ऑफ मास के मुताबिक किसी भी भौतिक या रासायनिक प्रक्रिया में द्रव्यमान को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है यानी मोटे शब्दों में कहें तो समूचे स्तर पर भार देखें तो ये ऐसी चीज है जो ना घटती है, ना बढ़ती है। तो ये तो आप जान ही गए कि पेड़ भी हवा-मिट्टी से पोषण लेकर अपना भार बढ़ाता है और हम भी पोषण लेकर ही अपना भार बढ़ाते हैं। इसी कारण से लकड़ियों में कार्बन का एक बड़ा हिस्सा होता है क्योंकि पौधों के पोषण का बड़ा हिस्सा कार्बन है। हम किताबों में पढ़ते आ रहे हैं कि पेड़-पौधे सूर्य की रोशनी में प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करते हैं, जिससे वे कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। दुनिया भर में चल रहे पर्यावरण सुधार अभियानों और जलवायु पूर्वानुमानों में जंगलों को सबसे बड़ा हथियार माना जाता है। सामान्य धारणा यही रही है कि पेड़ जितना अधिक कार्बन सोखेंगे, उतने ही बड़े, भारी और घने होंगे। इससे लकड़ी के रूप में कार्बन सदियों के लिए धरती में सुरक्षित लॉक हो जाएगा, जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग की रफ्तार धीमी होगी।
लेकिन, प्रसिद्ध साइंस जर्नल 'साइंस एडवांसेज' (Science Advances) में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस पुरानी और स्थापित मान्यता को पूरी तरह चुनौती दे दी है। कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल (Columbia Climate School) के शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में पाया है कि ओक (Oak) के पेड़ अपनी सालाना ग्रोथ रुकने के महीनों बाद तक वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोखना जारी रखते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि प्रकाश संश्लेषण और लकड़ी का बनना, आपस में उतने करीब से जुड़े नहीं हैं जितना दुनिया भर के वैज्ञानिक अब तक मानते आ रहे थे।
क्यों फेल हो रहे हैं पुराने 'क्लाइमेट चेंज मॉडल्स'?
अब तक वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि जैसे-जैसे मानवीय गतिविधियों के कारण वातावरण में CO2 का स्तर बढ़ेगा, पेड़ अधिक तेजी से भोजन बनाएंगे यानी उनका फोटोसिंथेसिस रेट बढ़ेगा। इसके चलते वे आकार में बड़े होंगे और अधिक मात्रा में कार्बन को अपने तनों, शाखाओं और जड़ों में हमेशा के लिए स्टोर कर लेंगे। लेकिन इस शोध के मुख्य लेखक और लेमोंट-डोहर्टी अर्थ ऑब्जर्वेटरी (Lamont-Doherty Earth Observatory) के इकोक्लाइमेटोलॉजिस्ट मुकुंद पलत राव की रिसर्च इस गणित को बिगाड़ती है। डॉ. राव कहते हैं कि वर्तमान में अधिकांश पर्यावरण मॉडल यह मानकर चलते हैं कि यदि प्रकाश संश्लेषण हो रहा है, तो पेड़ की ग्रोथ भी हो रही होगी। लेकिन हमने अपनी जांच में पाया कि ऐसा नहीं है। भविष्य में सिर्फ इसलिए कि पर्यावरण में अधिक प्रकाश संश्लेषण हो रहा है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि पेड़ों की ग्रोथ भी वैसी ही तेजी से होगी और जंगल उतने ही बड़े होते जाएंगे।"
लंबाई रुकने के बाद कहां जाता है वह 'एक्स्ट्रा कार्बन'?
जब पेड़ प्रकाश संश्लेषण के जरिए CO2 और पानी को शुगर में बदलते हैं, तो वह सारा कार्बन सिर्फ मजबूत लकड़ी बनाने के काम नहीं आता। शोध के अनुसार, जब सालाना विकास रुक जाता है, तब भी पेड़ कार्बन सोखते रहते हैं, लेकिन उस एक्स्ट्रा कार्बन का इस्तेमाल कई तरह की जैविक कार्यों में होता है। जैसे कार्बन का एक हिस्सा नई पत्तियों और फलों को बनाने में चला जाता है। कुछ हिस्सा स्टार्च के रूप में अस्थायी रूप से जमा होता है या फिर मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों को पोषण देने, पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता बढ़ाने और बीमारियों से लड़ने के लिए रसायनों के रूप में जड़ों से बाहर छोड़ दिया जाता है और कार्बन का कुछ हिस्सा पेड़ सर्दियों के दौरान अपनी जीवित कोशिकाओं को एक्टिव रखने और अगले सीजन की शुरुआती ग्रोथ के ईंधन के रूप में बचाकर रखते हैं।
चूंकि पत्ते और छोटे हिस्से जल्दी नष्ट होकर कार्बन वापस हवा में छोड़ देते हैं और केवल पेड़ का तना और मजबूत लकड़ी ही कार्बन को दशकों या सदियों तक सुरक्षित लॉक रख सकती है , इसलिए इस रिसर्च से साफ है कि भविष्य में जंगल हमारी उम्मीद और पुराने अनुमानों से काफी कम कार्बन स्टोर कर पाएंगे।
अमेरिका के जंगलों पर हुआ व्यापक शोध
वैज्ञानिकों को पहले से थोड़ा संदेह था कि कार्बन का एब्जॉर्प्शन और पेड़ों की ग्रोथ हमेशा एक साथ नहीं चलते, लेकिन इसके पीछे के पुख्ता सबूत नहीं थे। इसे साबित करने के लिए डॉ. मुकुंद पलत राव और उनकी टीम ने संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी क्षेत्र और कैलिफोर्निया में फैले 137 ओक के जंगलों के डेटा का बारीकी से विश्लेषण किया।
पूर्वी अमेरिका के ओक से पता चला कि ये पेड़ आमतौर पर मई से जुलाई तक शारीरिक रूप से बढ़ते हैं, लेकिन अक्टूबर तक कार्बन सोखते रहते हैं। यानी कुल सालाना कार्बन का लगभग 36% हिस्सा उनकी ग्रोथ रुकने के बाद सोखा जाता है।
वहीं कैलिफोर्निया के ओक का शेड्यूल अलग है। ये पेड़ दिसंबर से अप्रैल के बीच बढ़ते हैं, लेकिन अगस्त तक कार्बन सोखना जारी रखते हैं। यहां कुल सालाना कार्बन का 26% हिस्सा ग्रोथ रुकने के बाद जमा होता है।
मौसम के बदलते मिजाज और सूखे का असर
इस अंतर के पीछे का वैज्ञानिक कारण बहुत सीधा है। पेड़ों का बढ़ना उनके भीतर के आंतरिक पानी के दबाव पर निर्भर करता है। जैसे ही मौसम गर्म और सूखा होता है, यह दबाव तुरंत गिर जाता है और पेड़ों की ग्रोथ वहीं रुक जाती है। हालांकि, वे खुद को जीवित रखने के लिए थोड़े धीमे स्तर पर प्रकाश संश्लेषण जारी रखते हैं और भोजन बनाते रहते हैं।
शोधकर्ताओं ने एक और चौंकाने वाली बात नोट की। जिन वर्षों में मौसम अचानक बहुत गीले से बहुत सूखे की तरफ बदलता है, पेड़ों की ग्रोथ और कार्बन सोखने के बीच का यह अंतर और भी ज्यादा गहरा हो जाता है। चूंकि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में मौसम का यह उतार-चढ़ाव तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए आने वाले समय में यह असंतुलन और आम हो जाएगा।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
डॉ. राव और उनकी टीम अब यह जांच कर रही है कि क्या अन्य पेड़ों की प्रजातियों और अलग जलवायु वाले जंगलों में भी ऐसा ही व्यवहार देखने को मिलता है। फिलहाल, इस अध्ययन ने यह साफ कर दिया है कि कार्बन से भरी गर्म होती इस दुनिया में जंगलों के सहारे बैठे रहने की हमारी वैश्विक नीतियों और भविष्यवाणियों को अब नए सिरे से टटोलने की जरूरत है।