China Asteroid Mission: पृथ्वी के करीब से आए दिन बड़ी-बड़ी चट्टानें गुजरती हैं और उनको लेकर अलर्ट जारी होता है, जो वैज्ञानिकों की चिंता का विषय बना हुआ है। हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई ज्ञात एस्टेरॉयड, जिन्हें हम आसमानी आफत भी कहते हैं, नहीं है, जिसके निकट भविष्य में पृथ्वी से टकराने की संभावना है। इसके बावजूद हजारों ऐसे अंतरिक्ष पिंड अभी भी हैं जिनका अभी तक पता नहीं चल पाया है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए चीन ने एक बड़े 'स्पेस-ग्राउंड एस्टेरॉयड अर्ली वार्निंग नेटवर्क' (Space-Ground Asteroid Early Warning Network) बनाने का ऐलान किया है। इसका मकसद पृथ्वी के करीब आने वाले खतरनाक एस्टेरॉयड की पहचान करना और संभावित खतरे का चेतावनी देता है।
क्या बना रहा ड्रैगन?
स्पेस डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी (CNSA) ने अंतरराष्ट्रीय एस्टेरॉयड दिवस के मौके पर इस योजना का ऐलान किया। इस योजना के तहत दो स्तरों पर एस्टेरॉयड की निगरानी की जाएगी। सबसे पहले ऑप्टिकल टेलीस्कोप की मदद से लगातार आसमान की निगरानी की जाएगी। इसके अलावा, जिन एस्टेरॉयड को धरती से नहीं देख पाएंगे उन्हें अंतरिक्ष में तैनात सैटेलाइट नेटवर्क की मदद से खोजा जाएगा।
आसान भाषा में कहें तो धरती से लेकर अंतरिक्ष तक में ऐसा सिस्टम तैनात किया जाएगा, जिससे पृथ्वी के करीब आने वाले पिंडों की पहचान की जा सकें और समय रहते अलर्ट जारी हो। सबसे मुश्किल खतरनाक तो सूर्य की दिशा से आने वाले एस्टेरॉयड होते हैं, क्योंकि उन्हें जमीन से देख पाने बेहद कठित होता है और वह सूर्य की रोशनी में छिप जाते हैं। इसलिए पृथ्वी के साथ-साथ अंतरिक्ष में तैनात करने वाले सिस्टम की भी वैज्ञानिकों को जरूरत महसूस हुई।
asteroid
अगर आपको ज्ञात हो तो साल 2013 में रूस के चेल्याबिंस्क शहर के ऊपर एक उल्कापिंड विस्फोट हुआ था और वैज्ञानिक इस आसमानी आफत को नहीं देख पाए थे, क्योंकि यह सूर्य की दिशा से आई थी। जिसका पता तब चला जब वह पृथ्वी के वातावरण में दाखिल हो चुकी थी। ऐसे में चीन इसका खास ध्यान रखने वाला है और सूर्य की दिशा से आने वाले एस्टेरॉयड पर विशेष ध्यान देगा। चीन निगरानी के साथ ही एस्टेरॉयड की दिशा बदलने वाली तकनीक पर भी काम कर रहा है। हालांकि, इसके बारे में अभी ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।
अबतक कितने एस्टेरॉयड खोजे गए?
बकौल रिपोर्ट, अबतक 40,000 से अधिक निकट-पृथ्वी एस्टेरॉयड की पहचान हो चुकी है, जिनमें से 95 फीसदी से अधिक एस्टेरॉयड कम से कम एक किलोमीटर चौड़े हैं, जो वैश्विक स्तर पर तबाही फैलाने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, 140 मीटर आकार वाले महज लगभग 45 फीसदी एस्टेरॉयड का ही पता लगाया जा सकता है, जो किसी छोटे देश के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
कहां तैनात होगी निगरानी सैटलाइट
ड्रैगन ने अभी तक किसी कक्षा का चयन नहीं किया, लेकिन वैज्ञानिक चार संभावित कक्षाओं पर अध्ययन कर रहे हैं, जिनमें सन-अर्थ L1 लैग्रांज प्वाइंट, पृथ्वी से आगे या पीछे की कक्षा, शुक्र ग्रह जैसी सूर्य की परिक्रमा करने वाली कक्षा और डिस्टेंट रेट्रोग्रेड ऑर्बिट (DRO) शामिल हैं। इन जगहों से अंतरिक्ष के उन हिस्सों पर बेहतर नजर रखी जा सकती है, जहां से खतरनाक एस्टेरॉयड आने की संभावना अक्सर बनी रहती है।
Asteroid towards Earth
NASA का भी चल रहा एस्टेरॉयड मिशन
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भी पृथ्वी के करीब आने वाले एस्टेरॉयड की निगरानी के लिए अलग-अलग मिशनों पर काम कर रही हैं। नासा तो आए दिन एस्टेरॉयड का अलर्ट जारी करता है, जो पृथ्वी की कक्षा के करीब से गुजरते हैं।
