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मेंढ़कों से सीखकर वैज्ञानिकों ने बनाया खास न्यूरोमॉर्फिक सेंसर, जो बदल देगा AI की दुनिया

JNCASR के वैज्ञानिकों ने मेंढक से प्रेरित एक ऐसा न्यूरोमॉर्फिक सेंसर बनाया है जो दिमाग की तरह डेटा प्रोसेस और स्टोर कर सकता है। यह तकनीक बिजली बचाएगी और AI को स्मार्ट बनाएगी। आइए समझते हैं कैसे।

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मेंढक की नकल से विज्ञान में क्रांति

Photo : Times Now Digital

JNCASR Neuromorphic Sensor India: जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के वैज्ञानिकों ने विज्ञान की दुनिया में एक ऐसा कदम उठाया है, जो भविष्य के गैजेट्स को कुछ हद तक 'इंसानी' बनाएगा। उन्होंने एक ऐसा न्यूरोमॉर्फिक सेंसर (Neuromorphic Sensor) विकसित किया है, जो बिल्कुल हमारे दिमाग की तरह काम करता है। यह सेंसर न केवल नमी (Humidity) को महसूस करता है, बल्कि उस जानकारी को प्रोसेस और स्टोर भी कर सकता है। आसान भाषा में कहें तो, अब तक हमारे पास ऐसे सेंसर थे जो केवल 'महसूस' करते थे, लेकिन अब हमारे पास ऐसे सेंसर हैं जो 'समझते' भी हैं।

पुराने इलेक्ट्रॉनिक्स Vs न्यूरोमॉर्फिक सेंसर

तकनीकी पेचीदगियों को समझने के लिए आइए एक साधारण उदाहरण लेते हैं। कल्पना कीजिए कि आपको प्यास लगी है। आपके हाथ (सेंसर) ने गिलास को छुआ, यह जानकारी आपके हाथ से निकलकर नर्व्स के जरिए रीढ़ की हड्डी (डेटा ट्रांसफर) तक गई, फिर दिमाग के एक खास हिस्से (प्रोसेसर) ने तय किया कि गिलास उठाना है, और फिर याददाश्त (मेमोरी) ने बताया कि पानी कैसे पीना है। इस पूरी प्रक्रिया में जानकारी को एक जगह से दूसरी जगह भेजने में समय और ऊर्जा खर्च होती है, इसे आप पारंपरिक पुराना तरीका मान सकते हैं। अब जानते हैं न्यूरोमॉर्फिक तरीका क्या होगा। अब कल्पना कीजिए कि आपके हाथ के पास ही अपना एक छोटा सा 'दिमाग' है। जैसे ही हाथ ने गिलास छुआ, उसने खुद ही तय कर लिया कि क्या करना है और उस अनुभव को वहीं याद भी रख लिया। उसे जानकारी को बार-बार मुख्य दिमाग (सेंट्रल प्रोसेसर) के पास भेजने की जरूरत नहीं पड़ी। यही वह तकनीक है जिसे JNCASR के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। यह सेंसर एक ही स्थान पर सेंसिंग, प्रोसेसिंग और स्टोरेज का काम करता है, जिससे बिजली की भारी बचत होती है और काम की गति बढ़ जाती है।

मेंढक के व्यवहार से मिली प्रेरणा

प्रकृति हमेशा से ही बेहतरीन इंजीनियर रही है। इस सेंसर को बनाने की प्रेरणा 'क्रिकेट फ्रॉग' (Cricket Frog) नाम के एक खास मेंढक से मिली है। इस मेढक का तंत्रिका तंत्र (Synaptic Behavior) नमी और दिन की रोशनी के प्रति बहुत संवेदनशील होता है।

जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के शोधकर्ताओं ने एक नमी पर रिस्पॉन्स करने वाला न्यूरोमॉर्फिक डिवाइस विकसित किया है। शोधकर्ता तेजस्विनी एस. राव और सुकन्या बरुआ ने ने इस जैविक खूबी को मशीनों में उतारने के लिए 1D सुप्रामोल्युलर नैनोफाइबर्स का इस्तेमाल किया। इन नैनोफाइबर्स को कांच की एक प्लेट पर सोने के इलेक्ट्रोड के साथ जोड़कर एक स्मार्ट लेयर तैयार की गई। जब इस सेंसर के पास नमी के झोंके (Humidity Pulses) छोड़े गए, तो इसने बिजली के संकेतों के जरिए बिल्कुल वैसे ही प्रतिक्रिया दी जैसे मेंढक की नसें देती हैं।

यह सेंसर 'याद' कैसे रखता है?

इस आविष्कार की सबसे बड़ी खूबी इसकी 'छोटी याददाश्त' (Short-term memory) है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। जब हम किसी गरम चाय के कप को छूते हैं, तो हमारी उंगलियां तुरंत प्रतिक्रिया देती हैं। लेकिन अगली बार जब हम उसी कप को देखते हैं, तो हमारा दिमाग हमें पहले ही आगाह कर देता है कि यह गरम हो सकता है। इसे 'सिनैप्टिक प्लास्टिसिटी' कहते हैं। JNCASR का यह नया सेंसर भी ऐसा ही करता है। जब इसे नमी के संपर्क में लाया जाता है, तो यह न केवल वर्तमान स्थिति बताता है, बल्कि इसे यह भी 'याद' रहता है कि पिछली बार नमी का स्तर क्या था। यह पिछले संकेतों के आधार पर अपनी अगली प्रतिक्रिया को बदल सकता है। यह क्षमता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकती है, क्योंकि इसके बाद मशीनों को बार-बार पुराने डेटा को लोड करने की जरूरत नहीं होगी।

भविष्य की संभावनाएं और इस्तेमाल

यह तकनीक केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में यह हमारे दैनिक जीवन को कई क्रांतिकारी तरीकों से प्रभावित करेगी। स्मार्ट खेती के क्षेत्र में ये सेंसर मिट्टी की नमी को खुद महसूस और प्रोसेस कर सकेंगे, जिससे सिंचाई प्रणाली केवल तभी शुरू होगी जब वास्तव में आवश्यकता हो, जिससे पानी की भारी बचत होगी। वियरेबल हेल्थ केयर के रूप में आपकी त्वचा पर लगा एक छोटा सा पैच पसीने की नमी के जरिए शरीर के शुगर लेवल या डिहाइड्रेशन को ट्रैक कर डेटा खुद ही स्टोर कर सकेगा। वहीं, एज कंप्यूटिंग और AI के क्षेत्र में यह भविष्य के रोबोट्स को इतनी सक्षमता देगा कि वे बिना इंटरनेट या भारी प्रोसेसर के, केवल उमस या रोशनी जैसे पर्यावरणीय बदलावों को देखकर तुरंत सटीक फैसले ले सकेंगे। इसके अलावा, पर्यावरण सुरक्षा के नजरिए से ये सेंसर जंगलों में नमी के स्तर की निगरानी कर बिना बैटरी बदले सालों-साल काम कर सकते हैं, जिससे जंगल की आग जैसी आपदाओं का पूर्वानुमान लगाना और उन्हें रोकना संभव हो पाएगा।

एक टिकाऊ भविष्य की ओर कदम

कुल मिलाकर कहें तो आज की दुनिया डेटा की भूखी है, और इस डेटा को प्रोसेस करने के लिए अरबों डॉलर की बिजली खर्च होती है। JNCASR का यह 'बायो-इंस्पायर्ड' सेंसर उस ऊर्जा संकट का समाधान है। नमी को मुख्य ईंधन की तरह इस्तेमाल करके दिमाग जैसी सिस्टम विकसित करना विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है। यह न केवल तकनीक को स्मार्ट बना रहा है, बल्कि उसे प्रकृति के करीब भी ला रहा है।

Nishant Tiwari
निशांत तिवारी author

निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृ... और देखें

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