मोदी सरकार द्वारा दिल्ली के लिए लाए गए एक अध्यादेश के खिलाफ AAP के मुखिया अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) कई पार्टियों से समर्थन मांग चुके हैं। कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने उन्हें समर्थन का भरोसा भी दिया है, लेकिन इसी समर्थन के मुद्दे पर कई दल उन्हें आईना भी दिखा चुके हैं। कांग्रेस के बाद अब नेशनल कांफ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला (Omar Abdullah) ने केजरीवाल को आईना दिखा दिया है। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जब इन्हें जरूरत पड़ती है तो ये हमारे दरवाजे जरूर खटखटाते हैं, अरविंद केजरीवाल मुसीबत में है तो उन्हें हमारी सपोर्ट की जरूरत है, लेकिन ये 370 के समय में कहां थे?
क्या बोले उमर अब्दुल्ला
नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला से जब अध्यादेश विवाद पर केजरीवाल को समर्थन देने की बात पूछी गई तो वो बिफर पड़े। उन्होंने केजरीवाल पर भड़कते हुए कहा कि तब अरविंद केजरीवाल कहां थे, जब जम्मू-कश्मीर से 370 हटाया जा रहा था। उन्होंने कहा- "जब धारा 370 हटाई गई तो अरविंद केजरीवाल कहां थे? उन्होंने उस समय सरकार का समर्थन किया था और आज वे अन्य दलों से समर्थन मांग रहे हैं।"
किस-किस से समर्थन मांग चुके हैं केजरीवाल
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल इस अध्यादेश के खिलाफ समर्थन हासिल करने के लिए गैर-बीजेपी दलों के कई नेताओं के पास जा चुके हैं, ताकि संसद में लाए जाने पर इस विधेयक को पास करने से रोका जा सके। अब तक केजरीवाल उद्धव ठाकरे, शरद पवार, अखिलेश यादव, हेमंत सोरेन, एमके स्टालिन, सीताराम येचुरी, के चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जी और नीतीश कुमार से मुलाकात कर चुके हैं। इन नेताओं ने उन्हें सपोर्ट का भरोसा भी दिया है।
क्या है दिल्ली अध्यादेश विवाद
केंद्र ने 19 मई को दिल्ली में ग्रुप-ए के अधिकारियों के तबादले और पोस्टिंग के लिए एक प्राधिकरण बनाने के लिए अध्यादेश जारी किया था, जिसे आप सरकार ने सेवाओं के नियंत्रण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ धोखा बताया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और भूमि को छोड़कर दिल्ली में सेवाओं का नियंत्रण निर्वाचित सरकार को सौंपे जाने के एक सप्ताह बाद यह अध्यादेश आया। यह DANICS कैडर के ग्रुप-ए अधिकारियों के स्थानांतरण और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए एक राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण स्थापित करने की बात कहता है। शीर्ष अदालत के 11 मई के फैसले से पहले दिल्ली सरकार के सभी अधिकारियों के स्थानांतरण और पोस्टिंग लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यकारी नियंत्रण में थे।
