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'कानून बनाकर देशभक्ति पैदा नहीं कर सकते', 'वंदे मातरम' बिल पर CPI(M) का केंद्र पर हमला; अमित शाह से बिल वापस लेने की मांग

Vande Mataram Insult Punishable Bill: केंद्र सरकार संसद के मानसून सत्र के पहले दिन राज्यसभा में 'राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026' पेश करने जा रही है, जिसके तहत राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम' का अपमान करना या व्यवधान डालना दंडनीय अपराध होगा। इस कदम का उद्देश्य राष्ट्र गीत को राष्ट्र गान के समान वैधानिक दर्जा देना है।

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राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के अपमान पर 3 साल की जेल का प्रस्ताव (फाइल फोटो)

Photo : PTI

Vande Mataram Insult Punishable Bill: संसद के मानसून सत्र के पहले दिन सोमवार को राज्यसभा में एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील विधेयक पेश होने जा रहा है। सरकार 'राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026' लाने की तैयारी में है, जिसे गृह मंत्री अमित शाह उच्च सदन में रखेंगे। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम' को राष्ट्र गान 'जन गण मन' के समान ही वैधानिक संरक्षण देना है। नए प्रावधानों के तहत अब वंदे मातरम (Prevention of Insults to National Honour Bill) के गायन में बाधा डालना या उसका अपमान करना एक आपराधिक कृत्य माना जाएगा, जिसके लिए तीन साल तक की जेल हो सकती है। यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है जब देश में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।

हालांकि, सदन में पेश होने से पहले ही इस विधेयक को लेकर एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) को पत्र लिखकर केरल से CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा है कि इस प्रस्तावित बिल को वापस लिया जाए। अपने तर्क में जॉन ब्रिटास ने कहा है कि यह विधेयक उस ऐतिहासिक संवैधानिक सहमति के खिलाफ है, जिसे हमारे संविधान निर्माताओं ने बेहद सोच-समझकर तैयार किया था।

सवालों के केंद्र में मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट का आया वह फैसला भी है, जिसमें अदालत ने गृह मंत्रालय के उस जनवरी 2026 के प्रोटोकॉल में दखल देने से इनकार कर दिया था, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् बजाना अनिवार्य किया गया था। तब कोर्ट ने कहा था कि इस प्रोटोकॉल का कोई कानूनी बोझ या दंडात्मक परिणाम नहीं है। लेकिन अब आलोचकों का कहना है कि सरकार उसी बात को कानून बनाकर जबरन थोपना चाहती है, जिसे कार्यकारी आदेशों के जरिए लागू नहीं रखा जा सकता था।

विधेयक का विरोध कर रहे पक्षों का कहना है कि संविधान सभा ने जानबूझकर राष्ट्र गीत को राष्ट्र गान के बराबर वैधानिक दर्जा नहीं दिया था। यहां तक कि संविधान के अनुच्छेद 51A(a) के तहत भी नागरिकों का यह मौलिक कर्तव्य है कि वे संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गान का सम्मान करें, न कि राष्ट्र गीत का। 1971 के मूल कानून में भी जानबूझकर केवल राष्ट्र गान को ही दंडात्मक संरक्षण दिया गया था। आलोचकों का मानना है कि आपराधिक कानून के जरिए जबरन राष्ट्रवाद या देशभक्ति पैदा नहीं की जा सकती और यह कदम भारत के बहुलतावाद और वैचारिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत है। अब देखना होगा कि संसद में इस पर क्या बहस होती है।

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मोनू झाauthor

मोनू कुमार टाइम्स नाउ नवभारत की डिजिटल टीम में वायरल और ट्रेंडिंग डेस्क पर काम कर रहे हैं। न्यूजरूम में 4 साल से अधिक का अनुभव रखने वाले मोनू वायरल कंटेंट, ऑफबीट खबरों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स को पहचानने में बेहद दक्ष हैं। यूनीक एंगल तलाशने और कहानियों को आकर्षक अंदाज में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता उन्हें डिजिटल कंटेंट स्पेस में अलग पहचान देती है। मोनू कुमार 4,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं, जिनमें कई वायरल रिपोर्ट्स, ट्रेंड-बेस्ड अपडेट्स और सोशल मीडिया-फोकस्ड कंटेंट शामिल हैं।

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