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विवाहेतर संबंध छिपाने का जरिया नहीं बन सकता निजता का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने खींच दी लक्ष्मण रेखा

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शादी से इतर संबंध बनाने के एक मामले में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को लेकर एक बड़ी बात कह दी है।

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व्यभिचार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला (प्रतीकात्मक फोटो- Canva)

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने व्यभिचार के एक मामले पर ऐतिहासिक कानूनी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत मिलने वाला 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) कोई ऐसा सुरक्षा कवच नहीं है, जिसका इस्तेमाल कोई व्यक्ति विवाह से इतर संबंधों (Adultery) को छुपाने के लिए कर सके। अदालत ने साफ कहा कि कोई भी पति अपनी पत्नी को मोबाइल कॉल रिकॉर्ड और होटल में रुकने की जानकारी देने से इस आधार पर मना नहीं कर सकता कि इससे उसकी प्राइवेसी का हनन होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने दावा किया था कि अदालत में उसके ऐसे रिकॉर्ड्स का खुलासा होना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

निजता का अधिकार असीमित नहीं

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस पुराने आदेश को पूरी तरह सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि 'राइट टू प्राइवेसी' एक पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है। सार्वजनिक हित और न्याय के मामलों में इस पर तार्किक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की ही एक संवैधानिक पीठ के आदेश का हवाला दिया था, जिसके तहत, "शादी के दायरे से बाहर किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपसी सहमति से यौन संबंध बनाने की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।"

हिंदू मैरिज एक्ट और पब्लिक इंटरेस्ट का हवाला

अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारतीय कानून के तहत शादीशुदा जीवन में वफादारी की अपनी अहमियत है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, "भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार पर उचित प्रतिबंध लागू होते हैं, खासकर तब जब मामला जनहित या न्याय से जुड़ा हो। हिंदू मैरिज एक्ट (Hindu Marriage Act) स्पष्ट रूप से बेवफाई को तलाक का एक वैध आधार मानता है। इसलिए, यह बिल्कुल भी जनहित में नहीं होगा कि अदालत निजता के अधिकार के नाम पर किसी ऐसे विवाहित पुरुष की मदद करे, जिस पर शादी के अस्तित्व में रहते हुए भी बाहर संबंध रखने के आरोप हों।"

इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को मंजूरी दी थी, जिसमें होटल में रुकने के रिजर्वेशन डिटेल्स और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स सौंपने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी इस फैसले में कोई खामी नहीं पाई और उसकी अपील खारिज कर दी।

क्या था पूरा मामला?

यह कानूनी विवाद 1998 में शादी के बंधन में बंधे एक जोड़े से जुड़ा है, जिनकी साल 2000 में एक बेटी हुई। बाद में पत्नी को पता चला कि उसके पति का किसी अन्य महिला के साथ विवाहेतर संबंध है और वह जयपुर के एक होटल में उस महिला के साथ रुका था। पति की इस बेवफाई के सबूत जुटाने और तलाक का केस मजबूत करने के लिए पत्नी ने अदालत से होटल के रिकॉर्ड और कॉल डिटेल्स निकलवाने की मांग की थी, जिसे अब देश की सर्वोच्च अदालत ने भी पूरी तरह सही और कानूनी माना है।

Shishupal Kumar
शिशुपाल कुमारauthor

शिशुपाल कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क में कार्यरत एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 13 वर्षों का अनुभव हासिल है। राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय और क्राइम रिपोर्टिंग में गहरी रुचि और मजबूत पकड़ के साथ वे समाचारों की बारीकियों को समझने और उन्हें प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। शिशुपाल ने अपने करियर की शुरुआत एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के रूप में की, जहां उन्होंने प्रोडक्शन से लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग तक पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में काम किया। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों स्तरों पर उनकी दक्षता है। अब तक शिशुपाल कुमार 15,000 से अधिक खबरें प्रकाशित कर चुके हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज, रियल-टाइम कवरेज, डेटा-आधारित विश्लेषण और एक्सप्लेनर लिखने में खास महारत रखते हैं। उनकी स्टोरीज तथ्यों की सटीकता और सहज भाषा की वजह से पाठकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ती हैं।

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