सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की एक नई अर्जी खारिज कर दी। इसमें उन्होंने हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कोर्ट ने 2023 में पाटन विधानसभा क्षेत्र से उनके चुनाव के खिलाफ दायर चुनाव याचिका की 'सुनवाई योग्य होने' (maintainability) के मुद्दे पर कोई प्रारंभिक सवाल (preliminary issue) तय करने से इनकार कर दिया था।
इससे पहले 28 सितंबर को भी सुप्रीम कोर्ट ने, 2023 के चुनाव को लेकर बीजेपी नेता विजय बघेल द्वारा दायर चुनाव याचिका के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री की चुनौती में दखल देने से इनकार कर दिया था।
मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई में देरी करने की कोशिशों पर नाराजगी जताई। पीठ ने जोर देकर कहा कि चुनाव याचिकाओं का फैसला एक तय समय-सीमा के भीतर हो जाना चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा से न्यायमूर्ति मोहना ने कहा, 'सुनवाई को आगे बढ़ने दें। आप जितना हो सके देरी कर रहे हैं। फैसला तो आ ही जाएगा।'
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: 'धुरंधर' के Operation Regime Change पर नेताओं ने खुलकर रखी बात
सिब्बल ने कहा कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की है कि फैसले के लिए कोई प्रारंभिक मुद्दा (preliminary issue) नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि कोर्ट को या तो 'समय-सीमा' (limitation) के सवाल को एक प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करना चाहिए, या फिर यह नहीं कहना चाहिए कि ऐसा कोई मुद्दा ही नहीं है।सिब्बल ने कहा, 'हमारी दो मांगें हैं। या तो प्रारंभिक मुद्दे पर फैसला लें, या फिर यह न कहें कि कोई मुद्दा ही नहीं है। जबकि हाई कोर्ट ने कहा है कि कोई मुद्दा नहीं है।'
'यह आपत्ति पहले क्यों नहीं उठाई गई?'
इन दलीलों को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति मोहना ने कहा कि 'समय-सीमा' (limitation) से जुड़े मामलों में तथ्य और कानून दोनों शामिल होते हैं। उन्होंने सवाल किया कि यह आपत्ति पहले क्यों नहीं उठाई गई?उन्होंने कहा, 'आप यह बात पहले भी कह सकते थे।' उन्होंने आगे कहा कि बिना किसी ठोस आधार के कोई मुद्दा तय नहीं किया जा सकता।मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने भी सवाल किया कि बघेल ने अपने लिखित बयान (written statement) में जरूरी आपत्तियों को शामिल करने के लिए उसमें संशोधन (amendment) की मांग क्यों नहीं की?CJI ने कहा, 'किसी को तो आपको यह सलाह देनी चाहिए थी कि आप अपने लिखित बयान में संशोधन कर लें।'
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि चुनाव से जुड़े विवादों का फैसला एक तय समय-सीमा के भीतर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर इस अर्जी पर सुनवाई की गई, तो इससे और भी नई अर्जियां आ सकती हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया में और देरी होगी। 'यह सुनवाई में देरी करने का एक और तरीका है। अगर हम इसकी अनुमति दे देते हैं, तो आप बाद में संशोधन (amendment) की मांग करेंगे। चुनावी मामलों का निपटारा एक तय समय-सीमा के भीतर होना चाहिए,' उन्होंने कहा।
सिब्बल ने कहा कि बघेल संशोधन के लिए कोई अर्जी दाखिल नहीं करेंगे
सिब्बल ने कहा कि बघेल संशोधन के लिए कोई अर्जी दाखिल नहीं करेंगे और उन्होंने बेंच से अनुरोध किया कि उनके इस बयान को रिकॉर्ड में लिया जाए।बेंच ने कहा कि वरिष्ठ वकील के आग्रह पर ही उन्होंने याचिकाकर्ता पर जुर्माना (costs) नहीं लगाया है।'याचिका खारिज की जाती है। हम हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हैं,' CJI ने कहा।
बीजेपी नेता विजय बघेल ने यह याचिका दायर की थी
बीजेपी नेता विजय बघेल ने यह याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में पाटन निर्वाचन क्षेत्र से भूपेश बघेल के चुनाव को चुनौती दी थी।विजय बघेल का आरोप है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने मतदान से ठीक पहले के अनिवार्य 48 घंटे के 'साइलेंस पीरियड' (प्रचार-मुक्त अवधि) का उल्लंघन किया और अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक जुलूस निकाला।उन्होंने भूपेश बघेल के चुनाव को रद्द करने की मांग की है।पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से उठाई गई एक मुख्य आपत्ति 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' (Representation of the People Act, 1951) की धारा 81 के तहत तय 45 दिनों की कानूनी समय-सीमा (limitation period) से जुड़ी है।
सिब्बल ने दलील दी थी कि यह चुनाव याचिका समय-सीमा के दायरे से बाहर है
28 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई के दौरान, सिब्बल ने दलील दी थी कि यह चुनाव याचिका समय-सीमा के दायरे से बाहर है और इसे शुरुआत में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए था।विजय बघेल द्वारा दाखिल हलफनामे का जिक्र करते हुए, सिब्बल ने बताया कि उस पर 22 जनवरी 2024 की तारीख दर्ज है, जबकि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद की 45 दिनों की समय-सीमा 17 जनवरी 2024 को ही खत्म हो चुकी थी। 'जब हलफनामा समय पर दाखिल ही नहीं किया गया, तो चुनाव याचिका पर आगे कैसे सुनवाई हो सकती है? हलफनामा तो समय पर ही दाखिल होना चाहिए,' सिब्बल ने कहा था।बेंच ने टिप्पणी की कि इन तारीखों की सटीकता और इनके कानूनी नतीजों को सबूतों के आधार पर साबित करना होगा।बेंच ने यह सवाल भी उठाया कि समय-सीमा (limitation) से जुड़ी यह आपत्ति पहले क्यों नहीं उठाई गई थी।
