नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आने वाले दिनों में दिल्ली समेत कई राज्यों में बिजली की कीमतों में इजाफे की वजह बन सकता है। दरअसल, एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा कि वो बिजली कंपनियों के बकाया बिलों का भुगतान चार साल के भीतर करे जिसकी गणना 2024 से की जाएगी। रेगुलेटरी एसेट्स के रूप में जाने जानी वाली यह बकाया रकम देशभर में डेढ़ लाख करोड़ से भी ज्यादा है।
कोर्ट ने क्या कुछ कहा?
कोर्ट ने स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन से कहा कि वो इन बकाया रकम की बरामदगी को लेकर एक समयबद्ध रोड मैप दे। कोर्ट ने एपिलेट ट्रिब्यूनल फ़ॉर इलेक्ट्रिसिटी से कहा कि वो इन निर्देशों पर अमल पर निगरानी सुनिश्चित करे। कोर्ट ने अपने आदेश में स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन और APTEL की इस बात को लेकर की खिंचाई की कि वो बिजली कंपनियों के बकाए में हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी पर लगाम लगाने में नाकामयाब रहे हैं। जिसका बोझ आखिरकार उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस आशंका के मद्देनजर कि इस फैसले के चलते बिजली के रेट बढ़ सकते हैं, ये भी सुनिश्चित करने को कहा है कि बिजली की कीमतों में यह बढ़ोतरी गैरवाजिब नहीं होनी चाहिए। आदेश से साफ है बिजली की दरें बढ़ाई तो जा सकती हैं, लेकिन ये वाजिब और किफायती ही रहनी चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
ये याचिका शुरू में राजधानी दिल्ली में बिजली की सप्लाई करने वाली कंपनियों बीएसईएस यमुना पावर, बीएसईएस राजधानी और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड ने दाखिल की थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इसका दायरा बढ़ा दिया और उन सभी राज्यों को भी नोटिस जारी कर दिया जहां बिजली वितरण कंपनियों के बकाये जमा हो गए थे।
बिजली के दाम बढ़ने की आशंका इसलिए जताई जा रही, क्योंकि राज्यों में कंपनियों का भुगतान लंबे समय से अटका हुआ है। दिल्ली की बात करें तो भुगतान 17 साल से अटका हुआ है और बकाया रकम 20 हजार करोड़ तक पहुंच गई है। वहीं, तमिलनाडु में बिजली कंपनी का बकाया 87 हजार करोड़ रुपये का हो गया है। जाहिर बात है कि इसका असर बिजली की बढ़ती कीमतों के रूप में सामने आ सकता है।
