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'जब तक फांसी का मामला न हो, केस की सुनवाई उसी दिन नहीं होगी...'; सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी से उठे कई सवाल

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जब तक किसी की जान जाने का मामला न हो, केस उसी दिन लिस्ट नहीं किया जाएगा। उनकी टिप्पणी ने अदालतों में बढ़ते काम के बोझ और पेंडेंसी की हकीकत सामने रखी।

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न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ पर आज सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठतम जज जस्टिस सूर्यकांत में अहम टिप्पणी की

Photo : Times Now Digital

Supreme Court on Urgent Hearing Plea: सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प लेकिन गंभीर प्रसंग सामने आया। एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि उनके मुवक्किल का मकान आज नीलामी पर चढ़ने वाला है और अगर याचिका पर आज सुनवाई नहीं हुई, तो उसका कोई महत्व नहीं रहेगा।

इस पर सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज, जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी लेकिन सच्चाई बयां करती टिप्पणी की। उन्होंने कहा, 'जब तक किसी को फांसी नहीं दी जानी हो, मैं उसी दिन केस लिस्ट नहीं करूंगा। आप लोग जजों की हालत नहीं समझते…क्या आपको पता है हम कितने घंटे सो पाते हैं? जब तक किसी की आजादी दांव पर न हो, हम उसी दिन सुनवाई नहीं करेंगे।'

देश की अदालतों पर बढ़ता कार्यभार

जस्टिस सूर्यकांत की यह टिप्पणी सिर्फ एक पल की प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि देश की न्यायपालिका की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। देश की अदालतों में हर दिन लाखों मामले लंबित रहते हैं। जजों पर लगातार बढ़ते बोझ के कारण वे कई बार मानसिक और शारीरिक दबाव में काम करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में वकील की तर्कपूर्ण अपील

वकील का कहना था कि अगर इस मामले की सुनवाई तत्काल नहीं हुई, तो मकान नीलामी हो जाएगा और न्याय की गुहार व्यर्थ हो जाएगी। ऐसे मामलों में न्याय में देरी, न्याय से इनकार की कहावत सटीक बैठती है। लेकिन सच ये है कि न्यायपालिका के सीमित संसाधन और समय की कमी के कारण हर मामले को तुरंत प्राथमिकता देना संभव नहीं हो पाता।

आजादी दांव पर हो टिप्पणी का मतलब है?

जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी में छिपा संकेत यह है कि अदालतें सबसे पहले उन मामलों को प्राथमिकता देती हैं जहां किसी की जिंदगी या व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर लगी हो-जैसे गिरफ्तारी, जमानत, या मृत्युदंड। संपत्ति विवाद, नीलामी या अन्य दीवानी मामलों को उसी दिन सूचीबद्ध करना अदालतों के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता है।

न्यायपालिका की सीमाएं और जनता की अपेक्षाएं

यह टिप्पणी आम जनता और वकीलों के लिए एक संदेश भी है कि न्यायपालिका किसी मशीन की तरह नहीं चल सकती। हर जज इंसान है, जिसके पास सीमित समय और ऊर्जा होती है। लेकिन लोगों की उम्मीदें यही रहती हैं कि उनका मामला तुरंत सुना जाए और न्याय दिया जाए। यही द्वंद्व अदालतों की सबसे बड़ी चुनौती है।

अदालतों में लंबित मामलों का बोझ

देश भर में अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, भारत की निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट तक, कुल मिलाकर 5 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। अकेले जिला और उप-न्यायालयों में ही लगभग 4.3 करोड़ मामले विचाराधीन हैं।

सुप्रीम कोर्ट में भी करीब 88,000 से अधिक केस लंबित हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में यह संख्या 60 लाख से अधिक है। सुप्रीम कोर्ट में 29 मुकदमे तो ऐसे भी हैं जो 30 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इतनी बड़ी पेंडेंसी का सीधा असर न्याय पाने में होने वाली देरी पर पड़ता है। जजों की कमी, अधूरी आधारभूत संरचना और बढ़ते मामलों की संख्या इस संकट को और गहरा कर रही है।

जस्टिस क्लॉक- अदालतों की पारदर्शिता बढ़ाने की पहल

भारत में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को पारदर्शी और जनता के लिए सुलभ बनाने के उद्देश्य से जस्टिस क्लॉक पहल शुरू की गई। इसे सबसे पहले गुजरात हाइकोर्ट में लगाया गया था। यह एक बड़ी डिजिटल स्क्रीन होती है, जिसे देश के सभी उच्च न्यायालयों और कुछ जिला अदालतों के बाहर लगाया गया है।

इसमें अदालतों के कामकाज से जुड़े रियल-टाइम आँकड़े दिखाए जाते हैं- जैसे कितने मामले लंबित हैं, कितने निपटाए गए, औसत सुनवाई का समय, और जजों की उपलब्धता। इस पहल का मकसद जनता को न्यायिक व्यवस्था की सही तस्वीर दिखाना और न्यायपालिका में जवाबदेही व भरोसा बढ़ाना है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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