पद्म भूषण नहीं, भारत रत्न के हकदार हैं ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन, जेएमएम का दावा
- Edited by: Nilesh Dwivedi
- Updated Jan 26, 2026, 12:12 AM IST
झारखंड के आदिवासी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने अपने जीवन को आदिवासियों और वंचित समाज के उत्थान के लिए समर्पित किया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक के रूप में उन्होंने राज्य के गठन और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनकी राजनीतिक यात्रा संघर्ष और जनसेवा का प्रतीक बनी, जो आज भी आदिवासी आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा मानी जाती है।
शिबू सोरेन को पद्म भूषण का सम्मान (फोटो: PTI)
Shibu Soren Padma Bhushan: झारखंड में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण के बजाय भारत रत्न दिए जाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा घोषित पद्म भूषण सम्मान शिबू सोरेन के योगदान के अनुरूप नहीं है और उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज़ा जाना चाहिए। जेएमएम ने स्पष्ट किया है कि भारत रत्न की मांग आगे भी लगातार उठाई जाती रहेगी। जेएमएम के प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा कि शिबू सोरेन ने आदिवासियों और वंचित वर्गों के उत्थान में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है और वे भारत रत्न के वास्तविक हकदार हैं।
वहीं, पार्टी की राज्यसभा सांसद महुआ माजी ने केंद्र सरकार को पद्म भूषण के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि यह सम्मान पर्याप्त नहीं है। कांग्रेस नेता राजेश ठाकुर ने भी शिबू सोरेन को गरीबों और आदिवासियों की सशक्त आवाज बताते हुए भारत रत्न देने की मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “पद्म भूषण का हम स्वागत करते हैं, लेकिन भारत रत्न न दिया जाना हम सभी को पीड़ा देता है। हमें उम्मीद है कि केंद्र सरकार हमारी भावनाओं का सम्मान करेगी।” अगस्त 2024 में 81 वर्ष की आयु में शिबू सोरेन के निधन को झारखंड की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा गया। वहीं, झारखंड भाजपा अध्यक्ष आदित्य साहू ने पद्म भूषण दिए जाने को राज्य के लिए गर्व का विषय बताया।
11 जनवरी 1944 को हुआ था जन्म
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। वे ‘दिशोम गुरु’ के नाम से लोकप्रिय थे और देश की आदिवासी राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। उनका पूरा राजनीतिक जीवन आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई को समर्पित रहा। उनका बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। महज 15 साल की उम्र में उनके पिता सोबरन सोरेन की कथित तौर पर साहूकारों द्वारा हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया और यही उनके सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष की प्रेरणा बनी। वर्ष 1973 में शिबू सोरेन ने ए.के. रॉय और बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। यह पार्टी जल्द ही अलग झारखंड राज्य की मांग की प्रमुख आवाज बन गई और छोटानागपुर व संताल परगना क्षेत्रों में व्यापक जनसमर्थन मिला। सामंती शोषण के खिलाफ उनका जनआंदोलन उन्हें आदिवासी समाज का प्रतीक बना गया।
बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य का गठन
लंबे संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य का गठन हुआ। शिबू सोरेन का प्रभाव केवल राज्य तक सीमित नहीं रहा। वे आठ बार लोकसभा सांसद और एक बार राज्यसभा सदस्य रहे। केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान उन्होंने 2004 से 2006 के बीच कई बार कोयला मंत्री के रूप में कार्य किया, हालांकि इस दौरान वे कानूनी विवादों में भी घिरे रहे। 2004 में 1975 के चिरुडीह नरसंहार मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ, जिसके बाद वे कुछ समय के लिए भूमिगत हो गए। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में रखा गया, लेकिन सितंबर 2004 में जमानत मिलने के बाद वे फिर से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए। वर्ष 2008 में अदालत ने उन्हें इस मामले में दोषमुक्त कर दिया। 2006 में उन्हें अपने पूर्व निजी सचिव शशिनाथ झा के अपहरण और हत्या मामले में दोषी ठहराया गया था।
आदिवासी आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा
सीबीआई के अनुसार, यह हत्या 1993 के अविश्वास प्रस्ताव से जुड़े राजनीतिक लेन-देन की जानकारी के कारण की गई थी। यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बना, लेकिन शिबू सोरेन ने इस फैसले को चुनौती दी और अंततः 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके बरी होने को बरकरार रखा। विवादों के बावजूद शिबू सोरेन झारखंड की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में बने रहे। वे तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने, मार्च 2005 में मात्र 10 दिनों के लिए, अगस्त 2008 से जनवरी 2009 तक और दिसंबर 2009 से मई 2010 तक। गठबंधन राजनीति की अस्थिरता के कारण उनका कार्यकाल लंबा नहीं चल सका। 2007 में देवघर जिले में उनके काफिले पर बम हमला भी हुआ, जिसमें वे बाल-बाल बच गए। शिबू सोरेन को आज भी झारखंड के आदिवासी आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा और संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। 4 अगस्त 2025 को दिल्ली के एक अस्पताल में 81 वर्ष की आयु में शिबू सोरेन का निधन हो गया।
(इनपुट - पीटीआई)
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