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बाघों की संख्या इतनी बढ़ गई, जिन्हें संभालना हुआ मुश्किल; दिल्ली के पास ये जंगल बना वन विभाग के लिए चुनौती

Ranthambore Tiger Reserve Tiger Count: सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में बाघों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। यह वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है लेकिन यही सफलता वन विभाग के लिए चुनौती बन रही है।

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दिल्ली के पास ये जंगल बना वन विभाग के लिए चुनौती

Ranthambore Tiger Reserve: राजधानी दिल्ली के पास घूमने जाने की कई सारी जगह हैं। वहीं, दूर दूर से लोग रणथम्भौर बाघ अभयारण्य भी स्टे करने जाते हैं, जहां जंगली जानकारी देखने को मिलते हैं।...और जो लोग वाइल्ड लाइफ को पसंद करते हैं, उनके लिए यह जगह बेहद खास हो सकती है। बात दिल्ली से करें तो इस जंगल की दूरी बायरोड 400 किमी के आसपास है। साथ ही आप ट्रेन से भी कुछ घंटों में यहां पहुंच सकते हैं। रणथम्भौर बाघ अभयारण्य, राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में आता है। अब लेकिन यहां वन विभाग के लिए एक समस्या खड़ी हो गई है।

हाल ही में रणथम्भौर बाघ अभयारण्य से बाहर निकलने के बाद रविवार तड़के एक पांच सितारा होटल के पास दिखाई दिया बाघ अब सुरक्षित रूप से अभयारण्य क्षेत्र में लौट गया है। वन विभाग ने सोमवार को यह जानकारी दी। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में बढ़ती बाघ संख्या और क्षेत्रीय दबाव को लेकर चिंताओं को उजागर किया है।

बाघ सबसे पहले रविवार सुबह 6 बजे एक फार्महाउस के पास लगे कैमरे में नजर आया। बाद में वह अमरेश्वर क्षेत्र होते हुए होटल की ओर बढ़ा, जिसके बाद स्थानीय निवासियों ने वन विभाग को सूचित किया। वन विभाग की टीमें तुरंत मौके पर पहुंचीं और पगमार्क की जांच करते हुए बाघ की गतिविधियों पर नजर रखी।

वन संरक्षक मानस सिंह ने कहा, 'बाघ सुरक्षित रूप से जंगल में लौट गया है। टीमों ने लगातार निगरानी रखी ताकि वह सुरक्षित रूप से अभयारण्य में वापस जा सके।' उन्होंने बताया कि जिस क्षेत्र में बाघ की गतिविधियां देखी गयीं वहां आबादी नहीं थी इसलिए किसी तरह की तनावपूर्ण स्थिति नहीं बनी।

युवा बाघ नए क्षेत्र की तलाश में आ रहे बाहर

हाल के वर्षों में ऐसे मामले अधिक सामने आए हैं क्योंकि युवा बाघ नए क्षेत्र की तलाश में संरक्षित जंगल से बाहर निकलते हैं। सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में बाघों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। यह वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है लेकिन यही सफलता वन विभाग के लिए चुनौती बन रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों का कुनबा बढ़ने से जंगल छोटा पड़ रहा है और उनके लिए पर्याप्त बाघ पर्यावास नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि रणथम्भौर में युवा बाघ क्षेत्र की तलाश में लगातार जंगल की परिधि से बाहर निकल रहे हैं।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, लगभग 1,800 वर्ग किलोमीटर (सवाईमाधोपुर, धौलपुर और करौली जिले सहित बफर क्षेत्र) में फैले इस अभयारण्य में वर्तमान में लगभग 70 बाघ हैं।

क्यों बाहर आ जाते हैं बाघ?

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि उपलब्ध आवास आदर्श रूप से 40 से 50 बाघों को ही सहारा दे सकता है, जिससे भीड़भाड़ और क्षेत्रीय संघर्ष की चिंता बढ़ रही है। विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि एक बाघ 40 से 50 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में और बाघिन 20 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में रहती है। नया क्षेत्र बनाने के लिए बाघ कई बार राष्ट्रीय उद्यान से बाहर निकल जाते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेन्द्र खांडल ने बताया कि क्षेत्र की तलाश में रणथम्भौर के बाघ कई बार बाघ मुकुंदरा हिल्स बाघ अभयारण्य, रामगढ़ विषधारी अभयारण्य और कभी-कभी मध्यप्रदेश के जंगलों तक भी पहुंच जाते हैं। उन्होंने बताया कि रणथम्भौर के अलावा जहां-जहां बाघ अभयारण्य बनाए गए हैं वहां अभी भी गांवों का विस्थापन पूर्ण नहीं हो रहा है। बाघों के लिए गांवों का विस्थापन करना बहुत जरूरी है।

खांडल ने बताया कि रणथम्भौर के अलावा कैलादेवी अभयारण्य को भी बाघों के अनुकूल बनाना होगा। वहां किसी भी तरह का कन्जर्वेशन का काम नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि न तो वहां पर गांवों का विस्थापन हो पा रहा है और न ही समूचित वन प्रबंधन है।

पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा का सवाल

विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती बाघ गतिविधियों ने रणथम्भौर बाघ अभयारण्य के भीतर पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा चिंताओं को भी बढ़ा दिया है। त्रिनेत्र गणेश मंदिर और ऐतिहासिक रणथम्भौर किले के मार्ग पर अक्सर बाघ देखे जाते हैं, जिसके चलते अधिकारियों को समय-समय पर मार्ग बंद करना पड़ता है। पिछले वर्ष अप्रैल में मंदिर मार्ग पर एक बाघिन ने सात वर्षीय बच्चे पर हमला कर उसकी जान ले ली थी। मई में एक अन्य घटना में जोगी महल क्षेत्र में एक वन रेंजर की बाघ हमले में मौत हो गई थी।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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