Nepals flood fury- अगर उन्होंने चाय पीने के लिए 10-15 मिनट का ब्रेक न लिया होता, तो शायद वे नेपाल की उफनती भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों के भयावह सैलाब में बह गए होते। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रहने वाले पांच दोस्तों के लिए एक छोटी सी चाय की चुस्की जिंदगी का सबसे बड़ा वरदान साबित हुई। नेपाल के विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) और तबाही का खौफनाक मंजर अपनी आंखों से देखने के बाद, रायपुर के माना कैंप निवासी पांचों दोस्त—नारायण सेन, दिनेश ओझा, प्रेम सिंह जगत, यतेंद्र प्रकाश और दिनेश सिंह ठाकुर—शनिवार को सकुशल अपने घर लौट आए।
15 मिनट की देरी और टल गया महाकाल का साया
50 से 60 वर्ष की उम्र के इन दोस्तों ने 21 अगस्त को रायपुर से अपनी यात्रा शुरू की थी और 22 अगस्त को नेपाल पहुंचे थे। उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर, मनोकामना मंदिर और अन्य पर्यटन स्थलों के दर्शन के लिए एक गाड़ी किराए पर ली थी। 53 वर्षीय नारायण सेन, जो रायपुर में सैलून चलाते हैं, आपबीती बताते हुए कहा, हम बेहद भाग्यशाली थे कि 26 अगस्त की सुबह जब सैलाब आया, तब हम रास्ते में चाय पीने के लिए रुके हुए थे। अगर हम वहां से 10-15 मिनट पहले निकल गए होते, तो आगे बाढ़ के भयंकर जाल में फंस जाते। उस चाय के ब्रेक ने हमारी जान बचा ली।
त्रिशूली नदी में बहती कारें और शव
26 अगस्त की सुबह लगभग 9:30 से 10 बजे के बीच, यह समूह धाडिंग जिले के मलेखू (Malekhu) कस्बे में एक होटल पर रुका था। यह होटल एक भारतीय नागरिक का था, जिन्होंने संकट की इस घड़ी में इन दोस्तों को खाना और आश्रय दिया। नारायण सेन ने बताया, होटल पर ही हमें पता चला कि आगे का पुल पानी के तेज बहाव में ढह गया है। अपनी आंखों के सामने हमने त्रिशूली नदी में कारों को बहते देखा। नदी के खौफनाक उफान में लोगों के शव और सामान बहकर आ रहे थे। हम बुरी तरह डर गए थे और मन में लगातार डर बना हुआ था कि हालात कहीं और न बिगड़ जाएं।
कार बनी रात का ठिकाना, इंटरनेट ने दिया सहारा
छत्तीसगढ़ पुलिस में हेड कांस्टेबल 55 वर्षीय दिनेश सिंह ठाकुर ने बताया कि जब बाढ़ ने दस्तक दी, तब वे पशुपतिनाथ मंदिर से करीब 50 किलोमीटर दूर थे। ठाकुर ने कहा, होटल में चाय पीते समय अचानक लोगों में अफरा-तफरी मच गई। बाद में पता चला कि बाढ़ ने पूरे के पूरे गांव, इमारतें, दफ्तर और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स तबाह कर दिए हैं। हम स्थिति देखने नदी किनारे गए, लेकिन जो देखा उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। हम लगातार भगवान शिव का नाम जपते रहे, उन्हीं की कृपा से हम सुरक्षित बचे।
मलेखू में ऊंचाई पर स्थित एक जगह पर इन दोस्तों ने अपनी किराए की कार में ही दो खौफनाक रातें बिताईं। राहत की बात यह रही कि वहां इंटरनेट सेवा चालू थी, जिससे वे रायपुर में अपने परिजनों के संपर्क में रहे और भारतीय दूतावास की हेल्पलाइन पर अपनी लोकेशन शेयर करते रहे।
नेपाल की महिला सुरक्षाकर्मियों ने बांधी राखी
इस त्रासदी और खौफ के बीच इन दोस्तों के लिए सबसे भावुक और यादगार पल रक्षाबंधन के दिन आया। दिनेश सिंह ठाकुर ने भावुक होते हुए बताया, हमारा प्लान रक्षाबंधन के बाद लौटने का था, इसलिए हमारी बहनों ने हमें पहले ही राखियां दे दी थीं। जब हम वहां फंसे थे, तब वहां तैनात नेपाल की स्थानीय महिला सुरक्षाकर्मियों ने हमारी कलाई पर वे राखियां बांधीं। उस भयावह माहौल में वह पल हमारे दिल को सबसे ज्यादा सुकून देने वाला था।
"वह खौफनाक मंजर कभी नहीं भूल पाएंगे"
पेशे से दर्जी का काम करने वाले दिनेश ओझा ने कहा कि नेपाल में जो तबाही उन्होंने देखी, उसकी यादें ताउम्र उनका पीछा नहीं छोड़ेंगी। ओझा ने कहा, हम कार में सो जरूर रहे थे, लेकिन डर के मारे एक पल भी आंख नहीं लगी। मन में यही डर था कि कहीं पानी का कोई दूसरा सैलाब न आ जाए। लोग अपने लापता परिजनों को पागलों की तरह ढूंढ रहे थे। हम बेहद खुश और ईश्वर के आभारी हैं कि आखिरकार हम सही-सलामत अपने घर और परिवार के बीच वापस पहुंच गए हैं।
