Sanatan Dharma: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से संबद्ध अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने रविवार को दिल्ली में आयोजित आदिवासी सांस्कृतिक सम्मेलन को 'आदिवासी समाज का कुंभ' बताया और कहा कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए आदिवासियों का अस्तित्व आवश्यक है। आदिवासियों के आदर्श बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर लालकिला मैदान में आयोजित 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' को संबोधित करते हुए सिंह ने कहा कि आदिवासी संस्कृति भारत की आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है।
सिंह ने आदिवासी पहचान को संरक्षित करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, 'यदि आदिवासी समाज जीवित रहेगा तो सनातन धर्म जीवित रहेगा। यदि आदिवासी संस्कृति जीवित रहेगी तो भारत की संस्कृति जीवित रहेगी।' सिंह ने कहा, 'आदिवासी समुदाय सनातन संस्कृति और सभ्यता का संरक्षक एवं वाहक है।'
उन्होंने आदिवासियों के ईसाई धर्म तथा अन्य धर्मों में मतांतरण का मुद्दा भी उठाया और कहा कि इससे न केवल आदिवासी संस्कृति नष्ट हो रही है बल्कि समुदाय के संवैधानिक अधिकारों पर भी असर पड़ रहा है। सिंह ने कहा, 'सरकार को मिलकर इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए। अनुसूचित जनजातियों को उनके अधिकार और लाभ मिलने चाहिए।'
आदिवासी अपराधी नहीं, बल्कि भारत के गौरव हैं
इससे पहले सत्येंद्र सिंह ने बृहस्पतिवार को देश में आदिवासियों के बारे में विकृत औपनिवेशिक धारणाओं को सुधारने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वे भारत के गौरव और इसकी संस्कृति के रक्षक हैं, न कि अपराधी। उन्होंने कहा कि ब्रिटिशों शासकों ने उनके अपराधी होने की छवि पेश की थी। सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा कि वनवासी कल्याण आश्रम से संबद्ध जनजाति सुरक्षा मंच, आदिवासी प्रतीक बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर भारत के वनवासी समुदाय के बारे में दुनिया को एक सकारात्मक संदेश देने के लिए रविवार को यहां आदिवासियों का एक विशाल सांस्कृतिक सम्मेलन आयोजित कर रहा है।
