इन चुनावों में कई बड़े नामों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। महाराष्ट्र से Sharad Pawar, Priyanka Chaturvedi और Ramdas Athawale; तमिलनाडु से M. Thambidurai, Tiruchi Siva और Kanimozhi N. V. N. Somu; पश्चिम बंगाल से Saket Gokhale, Bikash Ranjan Bhattacharya और Subrata Bakshi; वहीं बिहार से Upendra Kushwaha, Ramnath Thakur और Harivansh Narayan Singh का कार्यकाल खत्म हो रहा है।
इन नामों से साफ है कि हर राज्य में सियासी वजनदार चेहरों की प्रतिष्ठा दांव पर है।
बिहार: सहयोगी ही सबसे बड़ी परीक्षा
बिहार में 5 सीटों पर चुनाव है। एनडीए के पास 202 विधायक हैं, जबकि एक उम्मीदवार की जीत के लिए 41 वोट जरूरी हैं। साधारण गणित से एनडीए चार सीटें सुरक्षित कर सकता है, लेकिन पांचवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी। महागठबंधन के पास करीब 35 विधायक हैं। यदि AIMIM और BSP साथ आते हैं तो विपक्ष एक सीट निकाल सकता है। एनडीए का फॉर्मूला 2 बीजेपी, 2 जेडीयू और 1 सहयोगी का बताया जा रहा है। लेकिन एलजेपी, हम और आरएलएम जैसे दल दावेदारी कर रहे हैं। अंदरूनी असंतोष यहां सबसे बड़ा जोखिम है, भले ही जेडीयू नेतृत्व पांचों सीट जीतने का दावा कर रहा हो।
महाराष्ट्र: गणित मजबूत, भरोसा कमजोर
महाराष्ट्र में 7 सीटों के लिए मुकाबला है। 288 सदस्यीय विधानसभा में एक सीट के लिए 37 वोट चाहिए। महायुति के पास 235 विधायक हैं, जिससे छह सीटें सुरक्षित दिखती हैं। लेकिन सीट बंटवारे पर खींचतान है। शिवसेना (शिंदे) दो सीटों की मांग कर रही है, जबकि बीजेपी तीन सीटें और एक सहयोगी (RPI) के लिए स्थान चाहती है। अगर Sharad Pawar निर्दलीय उतरते हैं तो क्रॉस-वोटिंग का खतरा भी बन सकता है। यहां चुनौती विपक्ष से ज्यादा भीतर की संतुलन साधने की है।
तमिलनाडु: यथास्थिति बरकरार?
तमिलनाडु में 6 सीटें हैं। मौजूदा समीकरण के अनुसार 4 सीटें डीएमके के खाते में जाती दिख रही हैं, एक एआईएडीएमके बचा सकती है और एक सीट पर मुकाबला संभव है। यहां बड़े उलटफेर की संभावना कम मानी जा रही है।
पश्चिम बंगाल: वाम की सीट पर नजर
पश्चिम बंगाल में 5 सीटों पर चुनाव है। टीएमसी चार सीटें बरकरार रख सकती है। सीपीएम की एक सीट पर बीजेपी की नजर है। अगर क्रॉस-वोटिंग हुई तो समीकरण बदल सकता है।
ओडिशा: भाजपा को बढ़त का मौका
ओडिशा में 4 सीटें हैं। मौजूदा ताकत के आधार पर बीजेपी तीन सीटें जीत सकती है, जबकि बीजेडी एक पर सिमट सकती है। भाजपा इसे विपक्ष के लिए चौंकाने वाला परिणाम बताने का दावा कर रही है।
असम, हरियाणा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, हिमाचल
असम में 3 सीटों में से दो बीजेपी के पास सुरक्षित दिखती हैं, तीसरी पर कांग्रेस-एआईयूडीएफ गठबंधन चुनौती दे सकता है।हरियाणा की 2 सीटों में से एक-एक पर बीजेपी और कांग्रेस की स्थिति बनती दिख रही है।छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दोनों सीटों में से एक पर बीजेपी सेंध लगा सकती है।तेलंगाना में 2 सीटों पर कांग्रेस की स्थिति मजबूत मानी जा रही है।हिमाचल प्रदेश में 1 सीट पर कांग्रेस को बढ़त मिल सकती है, जिससे बीजेपी को नुकसान संभव है।
किसे कितना फायदा?
अनुमान के मुताबिक एनडीए को 2-3 सीटों का शुद्ध फायदा हो सकता है, जबकि इंडिया ब्लॉक 3-4 सीटें खो सकता है। बीजेपी का आंकड़ा 9 से बढ़कर 12 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। कांग्रेस को भी सीमित लाभ मिल सकता है।लेकिन असली कहानी सीटों की संख्या से ज्यादा गठबंधन प्रबंधन की है। क्षेत्रीय दल—जैसे आरजेडी, एनसीपी (पवार गुट), शिवसेना (यूबीटी) और आरएलएम—पर दबाव है।
कुल मिलाकर यह चुनाव केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि संतुलन और सामंजस्य की परीक्षा है। अगर एनडीए अपने सहयोगियों को साधने में सफल रहता है तो राज्यसभा में बढ़त तय मानी जाएगी। लेकिन यदि अंदरूनी खींचतान बढ़ी तो यह चुनाव विपक्ष से पहले एनडीए की एकजुटता की असली परीक्षा साबित हो सकता है। अब नजर 16 मार्च की वोटिंग पर है—क्या एनडीए अपनी सियासी गांठें खोल पाएगा या बढ़त का मौका भीतर की खींचतान में उलझ जाएगा?
