संसद में जारी गतिरोध के बीच आज विपक्षी सांसदों ने लामबंद होकर लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए लोकसभा महासचिव को अविश्वास प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस मंगलवार को सौंपा है। अब लोकसभा सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि इस नोटिस की जांच की जाएगी और फिर संवैधानिक नियमों के तहत उस पर एक्शन लिया जाएगा। इस बीच, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने निर्णय लिया है कि नोटिस के निपटारे तक वे सदन की कार्यवाही में शामिल नहीं होंगे। सूत्रों ने बताया कि ऐसा उन्होंने नैतिक आधार पर किया है।
स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ क्यों हुआ विपक्ष एकजुट?
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ’’बोलने की इजाजत नहीं देने’’ तथा कांग्रेस की महिला सांसदों पर सदन में अनुचित स्थिति पैदा करने के आरोपों पर विपक्ष ने अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस मंगलवार को लोकसभा सचिवालय को सौंप दिया। निचले सदन में कांग्रेस के उप नेता गौरव गोगोई, कांग्रेस के मुख्य सचेतक कोडिकुनिल सुरेश और सांसद मोहम्मद जावेद तथा अन्य ने लोकसभा सचिवालय को यह नोटिस सौंपा। नोटिस पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रमुक और कई अन्य विपक्षी दलों के 100 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
अब आगे क्या?
संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के तहत यह प्रस्ताव संबंधी नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंपा गया है। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने कहा कि विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ नोटिस दिया है, जिस पर विचार किया जाएगा और नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
क्या पद से हटाने वाले प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अध्यक्ष कर सकता है सदन की अध्यक्षता
नहीं, पद से हटाने वाले प्रस्ताव पर जब लोकसभा में चर्चा या बहस हो रही होती है तब वह निम्न सदन का अक्ष्यक्ष लोकसभा की अक्ष्यक्षता नहीं कर सकता। संविधान के अनुच्छेद 94 सी के मुताबिक, जब ऐसे प्रस्ताव पर सदन में बहस चल रही हो तब लोकसभा उपाध्यक्ष या फिर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया गया अन्य सांसद सदन को संचालित करता है। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष को सदन में मौजूद रहने और बोलने का अधिकार होता है।
लोकसभा अध्यक्ष को हटाना कितना मुश्किल
चूंकि सामान्यतया लोकसभा अक्ष्यक्ष का पद उसी दल के पास होता है, जिसके पास बहुमत होता है और लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पर मतदान के समय बहुमत की गणना सामान्य प्रस्तावों से अलग तरीके से होती है। यही कारण है कि व्यवहारिक रूप से अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव पारित होना अत्यंत कठिन माना जाता है। इतिहास में लोकसभा अध्यक्ष को हटाने से जुड़े प्रस्ताव कई बार पेश किए गए हैं, लेकिन आज तक कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया है। इसका मुख्य कारण यह है कि आमतौर पर सत्तारूढ़ सरकार के पास सदन में संख्याबल होता है, जिससे ऐसे प्रस्ताव राजनीतिक रूप से सफल नहीं हो पाते।
