Sonam Raghuvanshi : मेघालय उच्च न्यायालय ने पूर्वोत्तर राज्य में हनीमून के दौरान अपने पति की कथित हत्या के मामले की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति डब्ल्यू. डिएंगदोह की एकल पीठ ने राज्य सरकार की उस आपराधिक याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 27 अप्रैल को निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत रद्द करने का अनुरोध किया था।
न्यायमूर्ति डिएंगदोह ने दलीलों को नहीं माना
न्यायमूर्ति डिएंगदोह ने कहा कि गिरफ्तारी का आधार तैयार करने का तरीका 'न्यायिक विवेक के पूर्ण अभाव’को दर्शाता है। अदालत ने कहा, 'यह स्पष्ट है कि गिरफ्तारी के आधार बिना किसी सोच-विचार के तैयार किया गया... इसमें कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि आरोपी के खिलाफ वास्तविक आरोप या विशिष्ट जानकारी क्या है।’ इसने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जमानत रद्द करने के लिए अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करने का कोई आधार नहीं बनता है।
गिरफ्तारी के आधार सही तरीके से बताने में विफल रही
शिलांग की अदालत ने सोनम को जमानत देते हुए कहा कि जांच एजेंसी उसकी गिरफ्तारी के आधार सही तरीके से बताने में विफल रही। अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी से जुड़े सभी दस्तावेज गिरफ्तारी मेमो, औचित्य (जस्टिफिकेशन) चेकलिस्ट, निरीक्षण मेमो और केस डायरी के अंश में हत्या से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के बजाय गलती से धारा 403(1) का उल्लेख किया गया था। अदालत ने कहा कि यह बार-बार हुई गलती महज टाइपिंग या क्लेरिकल त्रुटि नहीं मानी जा सकती, क्योंकि किसी भी दस्तावेज में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आरोपी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के समय कथित अपराध से जुड़े विशिष्ट तथ्यों की जानकारी भी आरोपी को नहीं दी गई।
यह केवल टाइपिंग की त्रुटि थी-मेघालय सरकार
इस जमानत आदेश को चुनौती देते हुए मेघालय सरकार ने हाईकोर्ट में दलील दी कि यह केवल टाइपिंग की त्रुटि थी, जिससे आरोपी को किसी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ। महाधिवक्ता अमित कुमार ने कहा कि सोनम को हत्या के आरोप की पूरी जानकारी थी, जिसका उल्लेख रिमांड आदेश, चार्जशीट और बाद की न्यायिक कार्यवाही में स्पष्ट रूप से मौजूद है। राज्य सरकार ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला देते हुए कहा कि ऐसी प्रक्रियात्मक त्रुटियां, जिनसे आरोपी को वास्तविक नुकसान न पहुंचे, सुधार योग्य होती हैं और केवल इसी आधार पर जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
