Maharashtra Politics: ठाणे जिले के अंबरनाथ नगर परिषद में बने भाजपा–कांग्रेस गठबंधन ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। देशभर में “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा देने वाली भाजपा ने सत्ता की गणित के लिए सीधे कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया है।
इस अप्रत्याशित गठबंधन का मकसद शिवसेना के शिंदे गुट को सत्ता से दूर रखना बताया जा रहा है। अंबरनाथ नगर परिषद में हुए इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
तेजश्री करंजुले चुनी गईं महापौर
अंबरनाथ नगर परिषद में भाजपा और कांग्रेस के समर्थन से भाजपा की तेजश्री करंजुले महापौर चुनी गईं। कुल 32 पार्षदों के समर्थन से भाजपा बहुमत की ओर बढ़ती नजर आ रही है। इस गठबंधन ने न सिर्फ स्थानीय राजनीति को गर्माया है, बल्कि भाजपा की घोषित राजनीतिक लाइन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिवसेना ने क्या कहा?
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने कहा कि अंबरनाथ में भाजपा और कांग्रेस के गठबंधन को लेकर सवाल भाजपा नेतृत्व से ही पूछे जाने चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा और शिवसेना वर्षों से केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों में साथ रहे हैं और यह गठबंधन अटूट रहना चाहिए। शिंदे ने दावा किया कि अंबरनाथ में शिवसेना के कार्यकाल में विकास के काम हुए हैं और शिवसेना आगे भी विकास की राजनीति करने वालों के साथ खड़ी रहेगी।
अकोला में भी राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी
अंबरनाथ के साथ-साथ अकोला जिले के अकोट नगर परिषद में भी भाजपा के गठबंधन को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हैं। अकोट में सत्ता बनाने के लिए भाजपा ने कांग्रेस नहीं, बल्कि एमआईएम के साथ हाथ मिलाया है। 35 सदस्यीय नगर परिषद में 33 सीटों के नतीजे घोषित हुए, जिनमें भाजपा को 11 सीटें मिलीं, जबकि बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए उसे सहयोगियों की जरूरत पड़ी।
इसके बाद भाजपा के नेतृत्व में ‘अकोट विकास मंच’ का गठन किया गया, जिसमें एमआईएम (5 सीटें), शिंदे गुट की शिवसेना (1), उद्धव गुट (2), अजित पवार गुट (2), शरद पवार गुट (1) और प्रहार जनशक्ति पार्टी (3) शामिल हुईं। इस गठबंधन के पास कुल 25 सदस्यों का समर्थन है और इसे जिला प्रशासन के पास पंजीकृत किया जा चुका है। वहीं, अकोट नगर परिषद में कांग्रेस (6 सीटें) और वंचित बहुजन आघाड़ी (2 सीटें) विपक्ष में बैठी हैं।
लगातार दो नगर निकायों में अलग-अलग दलों के साथ सत्ता के लिए गठबंधन करने पर अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या “पार्टी विद डिफरेंस” होने का दावा करने वाली भाजपा ने सत्ता की राजनीति में अपने पुराने उसूल पीछे छोड़ दिए हैं। अंबरनाथ और अकोट के घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर सत्ता की गणित राष्ट्रीय नारों से कहीं ज्यादा प्रभावी हो गई है।
