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वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस

Supreme Court SIR: सुप्रीम कोर्ट ने आज पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों पर अहम सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो- PTI)

Supreme Court SIR: सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के अधिकारों से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने उस याचिका पर चुनाव आयोग (Election Commission) को नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची (Voter List) से हटा दिए गए हैं, उन्हें सरकारी राशन, अन्नपूर्णा योजना और अन्य कल्याणकारी सुविधाओं से वंचित न किया जाए। यह याचिका बंगाल में हुए SIR से जुड़ी है।

जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए एक बार फिर यह स्पष्ट और ऐतिहासिक बात दोहराई कि चुनाव आयोग के पास भले ही वोटर लिस्ट से नाम हटाने का अधिकार है, लेकिन सिर्फ वोटर लिस्ट से नाम कट जाने का यह मतलब कतई नहीं है कि उस व्यक्ति की भारतीय नागरिकता (Indian Citizenship) खत्म हो गई है। कोर्ट ने कहा कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले पहले से ही पूरी तरह स्पष्ट हैं।

ट्रिब्यूनल की सुस्त रफ्तार पर उठे सवाल

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने कोर्ट के समक्ष इस पूरी व्यवस्था की खामियों और जमीनी हकीकत को उजागर किया। उन्होंने बताया कि इस विशेष मामले के निपटारे के लिए गठित किए गए 19 ट्रिब्यूनल बेहद धीमी गति से काम कर रहे हैं। ट्रिब्यूनल के पास वर्तमान में लगभग 34 लाख अपीलें लंबित हैं, लेकिन अब तक केवल 38,000 मामलों का ही फैसला हो सका है। जिन बहुत कम मामलों का फैसला हुआ है, उनमें से भी 70 प्रतिशत लोगों को दोबारा सही मतदाता माना गया है। केवल 30 प्रतिशत लोगों की अपील खारिज हुई है, जो अब राहत के लिए हाई कोर्ट का रुख करेंगे।

सबसे बड़ी चिंता

वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि जिन लाखों लोगों की अपीलें अभी ट्रिब्यूनल में लंबित हैं, उनके नाम वोटर लिस्ट में न होने के कारण उन्हें सरकारी राशन और अन्नपूर्णा जैसी अत्यंत आवश्यक जीवन रक्षक योजनाओं के लाभ से वंचित किया जा रहा है, जो कि उनके जीने के अधिकार का हनन है।

'चुनाव आयोग नागरिकता तय करने वाली अथॉरिटी नहीं है'

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने नागरिकता और मतदाता सूची के अंतर को बेहद स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया। उन्होंने साफ किया कि चुनाव आयोग किसी भी व्यक्ति की नागरिकता तय करने वाली संस्था नहीं है।

अंतिम निर्णय किसका?

जस्टिस बागची ने कहा कि यदि ट्रिब्यूनल भी किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल करने से मना कर देता है, तो भी उसकी नागरिकता का अंतिम फैसला नागरिकता कानून (Citizenship Act) के तहत संबंधित मंत्रालय ही करेगा, न कि चुनाव आयोग। अदालत ने इस गंभीर विषय पर चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। अब इस बेहद महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।

Shishupal Kumar
शिशुपाल कुमारauthor

शिशुपाल कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क में कार्यरत एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 13 वर्षों का अनुभव हासिल है। राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय और क्राइम रिपोर्टिंग में गहरी रुचि और मजबूत पकड़ के साथ वे समाचारों की बारीकियों को समझने और उन्हें प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। शिशुपाल ने अपने करियर की शुरुआत एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के रूप में की, जहां उन्होंने प्रोडक्शन से लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग तक पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में काम किया। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों स्तरों पर उनकी दक्षता है। अब तक शिशुपाल कुमार 15,000 से अधिक खबरें प्रकाशित कर चुके हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज, रियल-टाइम कवरेज, डेटा-आधारित विश्लेषण और एक्सप्लेनर लिखने में खास महारत रखते हैं। उनकी स्टोरीज तथ्यों की सटीकता और सहज भाषा की वजह से पाठकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ती हैं।

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