नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने कहा है कि झारखंड में दुर्घटनाग्रस्त हुए लगभग 40 साल पुराने बीचक्राफ्ट सी90ए विमान में ’कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर’ या ’फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर’ नहीं थे। विमानों में इन उपकरणों को अनिवार्य रूप से लगाने का नियम उस वक्त लागू नहीं था, जब 1987 में इस विमान को उड़ान योग्यता प्रमाण पत्र जारी किया गया था।
रेडबर्ड एयरवेज प्राइवेट लिमिटेड का बीचक्राफ्ट सी90ए विमान वीटी-एजेवी 23 फरवरी को दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस विमान का संचालन रांची से दिल्ली के लिए एयर एम्बुलेंस के रूप में किया जा रहा था। उड़ान भरने के तुरंत बाद यह दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।झारखंड के चतरा जिले में हुई इस दुर्घटना में, विमान में सवार पांच लोगों और चालक दल के दो सदस्यों की मौत हो गई थी।
'विमान में ब्लैक बॉक्स नहीं था'
डीजीसीए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह विमान 1987 में निर्मित हुआ था और इसका उड़ान योग्यता प्रमाणपत्र 20 जनवरी 2027 तक वैध था। दुर्घटना के संभावित कारणों की जांच में जांचकर्ताओं के लिए एक बाधा यह हो सकती है कि विमान में ब्लैक बॉक्स नहीं था। ब्लैक बॉक्स, जिसे कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) और फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) कहा जाता है, उड़ान के दौरान महत्वपूर्ण डेटा रिकॉर्ड करता है।
नियमों के अनुसार, 5,700 किलोग्राम से कम ’टेक-ऑफ’ भार वाले विमानों के लिए अनिवार्य रूप से सीवीआर लगाना आवश्यक है, लेकिन केवल तभी जब उन्हें 1 जनवरी 2016 को या उसके बाद यह प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ हो। इसी प्रकार, एफडीआर लगाना केवल उन विमानों के लिए अनिवार्य है जिनका ’टेक-ऑफ’ भार 5,700 किलोग्राम से कम है और जिन्हें 1 जनवरी 1987 को या उसके बाद उड़ान योग्यता प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ हो।
क्रैश हुआ एयर एंबुलेंस महज एक विमान हादसा भर नहीं
झारखंड के चतरा में क्रैश हुआ एयर एंबुलेंस महज एक विमान हादसा भर नहीं है, बल्कि एक परिवार की उस टूटी हुई उम्मीद भी है जिसने अपने एक सदस्य को बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। लातेहार के चंदवा निवासी संजय कुमार के लिए जो विमान जीवन रक्षक बनकर उड़ा था, वही चंद मिनटों में काल का ग्रास बन गया।
जिंदगी बचाने की आखिरी उम्मीद टूट गई
लातेहार के चंदवा में रहने वाले संजय कुमार के घर में कुछ दिन पहले तक सब ठीक था। लेकिन दुकान में शॉर्ट सर्किट से लगी एक आग ने खुशियों को मातम में बदल दिया। संजय 63% तक झुलस गए। परिजनों ने रांची के देवकली अस्पताल में भर्ती कराया और इलाज चलता रहा। जब हालात नहीं सुधरे तो डॉक्टरों ने दिल्ली ले जाने की सलाह दी। सड़क के रास्ते ले जाने पर मरीज के लिए खतरनाक हो सकता था। परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी और दिल्ली के बड़े अस्पताल में इलाज कराने के लिए करीब साढ़े सात लाख रुपये लगाकर एक एयर एंबुलेंस बुक की।
