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यौन अपराधों में संवेदनशीलता के लिए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, अदालतों और पुलिस को भेजी जाएंगी नई गाइडलाइंस

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने देश में महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन अपराधों (Sexual Offences) के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील, सम्मानजनक और पीड़ित-केंद्रित बनाने के लिए एक ऐतिहासिक निर्देश जारी किया है।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो- PTI)

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA), भोपाल द्वारा तैयार की गई विस्तृत गाइडलाइंस देश की सभी हाईकोर्टों, जिला अदालतों, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों (SLSA), राज्य सरकारों के विधि विभागों और अभियोजन निदेशालयों को भेजी जाएं।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने अभियोजन निदेशालयों को यह भी निर्देश दिया कि वे इन गाइडलाइंस को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाएं और पुलिस को आवश्यक निर्देश जारी करें। अदालत ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने के दौरान जरूरी कानूनी सावधानियों और संवेदनशीलता का पालन किया जाए।

CJI ने रिपोर्ट की सराहना की

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की रिपोर्ट को "बेहद उल्लेखनीय रिपोर्ट" बताते हुए इसकी तैयारी में शामिल टीम की सराहना की।

कैसे शुरू हुआ मामला?

यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेकर दर्ज की गई आपराधिक रिट याचिका संख्या 1/2025 से जुड़ा है। मार्च 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा था कि नाबालिग लड़की का स्तन पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलने की कोशिश करना "दुष्कर्म का प्रयास" नहीं बल्कि केवल "दुष्कर्म की तैयारी" है। इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई थी।

इसके बाद बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले 250 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों के नेटवर्क Just Rights for Children (JRC) ने पीड़िता की ओर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

26 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए यौन अपराधों से जुड़े मामलों में असंवेदनशील भाषा और टिप्पणियों पर चिंता जताई थी।

बाद में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला स्पष्ट रूप से गलत है और आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने दोनों आरोपियों के खिलाफ POCSO Act के तहत दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का आरोप भी बहाल कर दिया।

NJA को गाइडलाइंस तैयार करने का मिला था जिम्मा

सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल को एक विशेषज्ञ समिति गठित कर ऐसी व्यापक गाइडलाइंस तैयार करने का निर्देश दिया था, जिससे यौन शोषण के पीड़ितों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायपालिका अधिक संवेदनशील और जवाबदेह तरीके से काम करे। समिति को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने क्या कहा?

Just Rights for Children की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने कहा कि ऐसी गाइडलाइंस की लंबे समय से आवश्यकता महसूस की जा रही थी। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की असंवेदनशील टिप्पणियों ने इन दिशानिर्देशों की जरूरत को और भी स्पष्ट कर दिया। अब इन्हें पूरी गंभीरता और प्रभावी तरीके से लागू किया जाना चाहिए, ताकि यौन हिंसा और शोषण का सामना करने वाली महिलाओं और बच्चों को सम्मान के साथ न्याय मिल सके।

Shishupal Kumar
शिशुपाल कुमारauthor

शिशुपाल कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क में कार्यरत एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 13 वर्षों का अनुभव हासिल है। राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय और क्राइम रिपोर्टिंग में गहरी रुचि और मजबूत पकड़ के साथ वे समाचारों की बारीकियों को समझने और उन्हें प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। शिशुपाल ने अपने करियर की शुरुआत एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के रूप में की, जहां उन्होंने प्रोडक्शन से लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग तक पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में काम किया। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों स्तरों पर उनकी दक्षता है। अब तक शिशुपाल कुमार 15,000 से अधिक खबरें प्रकाशित कर चुके हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज, रियल-टाइम कवरेज, डेटा-आधारित विश्लेषण और एक्सप्लेनर लिखने में खास महारत रखते हैं। उनकी स्टोरीज तथ्यों की सटीकता और सहज भाषा की वजह से पाठकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ती हैं।

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