Mamata Banerjee: बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रस की भारी हार हुई है। यहां तक कि मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी भी अपना सीट नहीं बचा पाईं। भवानीपुर सीट से वह हार गईं। इस सीट पर उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें 15 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। इस हार के साथ ममता के नाम एक और शर्मनाक रिकॉर्ड जुड़ गया है। वह पद पर रहते हुए विधानसभा चुनाव दूसरी बार हारने वाली देश की पहली मुख्यमंत्री बन गई हैं। इससे पहले 2021 के चुनाव में सुवेंदु ने उन्हें नंदीग्राम सीट पर हराया था लेकिन इस बार ममता ने अपने लिए सुरक्षित सीट मानी जाने वाली भवानीपुर से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
ममता को 58,812 वोट मिले
भवानीपुर टीएमसी का गढ़ है और ममता बनर्जी का घर भी यहीं है। स्वाभाविक है कि यह सीट उनके लिए सुरक्षित थी। 2021 में जब वह नंदीग्राम में चुनाव हार गईं तो उसके बाद इसी सीट पर हुए उपचुनाव को जीतकर वह विधानसभा पहुंचीं लेकिन इस बार इस सीट पर भाजपा ने उनकी घेराबंदी इस तरह से की, ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया जिसे वह तोड़ नहीं पाईं। इस सीट पर ममता को 58,812 वोट और सुवेंदु को 73,917 वोट मिले। यहां हम बात करेंगे कि अपनी इस सुरक्षित सीट को ममता आखिर बचा क्यों नहीं पाईं।
1-आक्रामक चुनावी रणनीति
सुवेंदु ने चुनाव को पूरी तरह व्यक्तिगत मुकाबले में बदला
घर-घर संपर्क और स्थानीय मुद्दों पर फोकस ने बढ़त दिलाई
ममता का प्रचार अभियान स्थानीय मुद्दों से कटा नजर आया
जिससे मुकाबला एकतरफा हो गया.
2-लोकल लेवल पर मजबूत पकड़
-लंबे समय तक TMC में रहे और मजबूत संगठन खड़ा किया
-BJP में जाने पर नेटवर्क भी उनके साथ चला गया
-बूथ स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत रहती है
3-सत्ता विरोधी लहर
-TMC पर भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था खराब होने के आरोप लगे
-सुवेंदु अधिकारी ने इन मुद्दों को जोर-शोर से उठाया
-जिसने मतदाताओं को बड़े स्तर पर प्रभावित किया
-सीधा असर वोटिंग पैटर्न पर पड़ा, ममता को नुकसान हुआ
4- इनसाइडर vs आउटसाइडर
-सुवेंदु ने स्थानीय नेता के तौर पर खुद को पेश किया
-जबकि ममता बनर्जी पर बाहरी होने का आरोप लगाया
-चुनाव में ये नैरेटिव काफी असरदार साबित हुआ
-ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनाने का कम किया।
5-ध्रुवीकरण और स्पष्ट वोट ट्रांसफर
-BJP ने कोर वोट बैंक को पूरी तरह एकजुट रखा
-TMC के वोटों में कुछ हद तक बिखराव देखने को मिला
-शहरी और मध्यमवर्गीय इलाकों में BJP को बढ़त मिली
-जिससे मुकाबला एकतरफा हो गया
अपनी आंदोलनकारी छवि में लौट सकती हैं ममता
बनर्जी के लिए अब चुनौती सिर्फ चुनावी वापसी की नहीं, बल्कि संगठनात्मक अस्तित्व की भी है। बनर्जी के लिए परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। 71 वर्ष की आयु में, तीन कार्यकाल पूरे करने के बाद, वापसी का रास्ता उनके करियर के किसी भी पिछले पड़ाव से कहीं अधिक कठिन प्रतीत होता है। फिर भी, 'दीदी’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी की राजनीति का इतिहास प्रतिरोध से ही फलता-फूलता रहा है। सत्ता से बेदखल होने पर, बनर्जी उसी शैली में लौटने का प्रयास कर सकती हैं जिसमें तृणमूल को विपक्षी ताकत में परिवर्तित करना, और इसकी राजनीतिक शक्ति को फिर से हासिल करना शामिल है।
