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किस प्रधानमंत्री के खिलाफ कितनी बार पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव और कितनी बार गिरी सरकारें? जानें इससे जुड़ी छोटी-बड़ी बात

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jul 26, 2023, 11:03 AM IST

NO-Confidence Motion: भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्ष की ओर से अविश्वास प्रस्ताव लाया जा रहा है। इससे पहले 2018 में भी अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया था। 11 घंटे तक चली बहस के बाद मोदी सरकार ने बड़ी आसानी से बहुमत साबित कर अविश्वास प्रस्ताव को गिरा दिया था।

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No-confidence Motion

Photo : BCCL

NO-Confidence Motion: मणिपुर हिंसा हो लेकर संसद में घमासान जारी है। सरकार और विपक्ष के बीच तीखा गतिरोध है। आप सांसद संजय सिंह शेष बचे मानसून सत्र के लिए निलंबित हो चुके हैं और सदन की कार्यवाही हर दिन बाधित हो रही है। इस बीच विपक्षी गठबंधन INDIA ने नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया है।

लोकसभा में आज इस अविश्वास प्रस्ताव को पेश किया जाएगा। हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं होगा जब मजबूत भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्ष की ओर से अविश्वास प्रस्ताव लाया जा रहा हो। इससे पहले 2018 में भी अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया था। 11 घंटे तक चली बहस के बाद मोदी सरकार ने बड़ी आसानी से बहुमत साबित कर अविश्वास प्रस्ताव को गिरा दिया था।

आइए जानते हैं, अविश्वास प्रस्ताव होता क्या है? यह कैसे लाया जाता है? अब तक संसद में कितनी बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है? कौन सी सरकार ने सबसे ज्यादा बाद इसका सामना किया है और अविश्वास प्रस्ताव के चलते कितनी बार सरकार गिरी है?

क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव?

संविधान के आर्टिकल-75 में नो कॉन्फिडेंस मोशन(अविश्वास प्रस्ताव) का जिक्र किया गया है। इसके अनुसार, केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होता है। यानी सदन को लगता है कि सरकार बहुमत खो चुकी है, तो प्रधानमंत्री समेत पूरे मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना होता है। सीधे शब्दों में कहें तो जब विपक्ष को लगता है कि मौजूदा सरकार के पास बहुमत नहीं रहा है, तो अविश्वास प्रस्ताव को पेश किया जाता है।

अविश्वास प्रस्ताव कैसे लाया जाता है?

जब विपक्ष के किसी दल को लगता है कि सरकार बहुमत खो चुकी है, तो उस दल को लोकसभा अध्यक्ष या स्पीकर को इसकी लिखित सूचना देनी होती है। इसके बाद स्पीकर उस दल के किसी सांसद को इसे पेश करने के लिए कहता है। इस प्रस्ताव को तब ही स्वीकार किया जा सकता है, जब सदन में उसे कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के 10 दिनों के बाद इस पर चर्चा जरूरी होती है। इसके बाद स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोटिंग करा सकता है, या फिर कोई फैसला ले सकता है। यहां एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत नियम 198 कहता है कि सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को केवल लोकसभा से ही लाया जा सकता है, राज्यसभा से नहीं। वहीं, सिर्फ लोकसभा के सदस्यों के पास ही इस पर वोटिंग करने का अधिकार होता है।

अब तक कितनी बार लाया गया है अविश्वास प्रस्ताव?

लोकसभा में अब तक 27 बार अविश्वास प्रस्ताव लाए जा चुके हैं। सबसे पहले 1963 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। तब समाजवादी नेता आचार्य कृपलानी, नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे। हालांकि, नेहरू सरकार ने आसानी से बहुमत साबित कर दिया था। इस अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े थे, जबकि 347 वोट विरोध में थे।

किस प्रधानमंत्री के खिलाफ आए सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव?

यह बात तो स्पष्ट हो गई है कि देश के इतिहास में अब तक 27 बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं। हालांकि, सबसे ज्यादा बार इसका सामना करने का रिकॉर्ड इंदिरा गांधी सरकार के नाम है। इंदिरा गांधी ने कुल 15 बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया। वहीं लाल बहादुर शास्त्री और नरसिंह राव की सरकारों के खिलाफ तीन-तीन बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए थे। इसके अलावा अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ दो बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। इसके अलावा राजीव गांधी, वीपी सिंह, चौधरी चरण सिंह, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी सरकार ने भी एक-एक बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया। हालांकि, केवल तीन बार ही सरकारें गिरी हैं। 1990 में वीपी सिंह, 1997 में एचडी देवगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास हुए थे।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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