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Gyanvapi ASI Survey Report: ज्ञानवापी मस्जिद ASI सर्वे रिपोर्ट के 10 अहम सबूत...जिससे साबित होता मंदिर तोड़कर बनाई गई थी मस्जिद

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jan 26, 2024, 08:09 PM IST

10 point on Gyanvapi ASI Survey Report in Hindi: हिंदू पक्ष लगातार दावा करता रहा है कि मस्जिद 17वीं शताब्दी में काशी विश्वनाथ मंदिर के विनाश के बाद उसके स्थान पर बनाई गई थी।आइए जानते हैं ASI की रिपोर्ट के 10 अहम सबूत। Gyanvapi Case Update Today in Hindi

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ज्ञानवापी परिसर

Photo : BCCL

Exclusive Gyanvapi ASI Survey Report in Hindi: वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर को लेकर बड़े खुलासे किए गए हैं। ASI की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जिस जगह पर ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Masjid) का निर्माण किया गया था, वहां पर पहले हिंदू मंदिर था। गुरुवार रात दस बजे वाराणसी जिला अदालत ने काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए सर्वे की रिपोर्ट पक्षकारों को सौंप दी। बता दें, हिंदू पक्ष लगातार दावा करता रहा है कि मस्जिद 17वीं शताब्दी में काशी विश्वनाथ मंदिर के विनाश के बाद उसके स्थान पर बनाई गई थी।

वाराणसी की जिला अदालत ने जुलाई, 2023 में ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Masjid) परिसर का सर्वे कराने का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपा था। अब ASI की रिपोर्ट सामने आ गई है। आइए जानते हैं इस रिपोर्ट के वे 10 अहम सबूत, जिनसे साबित होता है कि ज्ञानवापी मस्जिद परिसर 17वीं शताब्दी से पहले हिंदू मंदिर था...

Gyanvapi ASI सर्वे रिपोर्ट के 10 अहम सबूत(Gyanvapi ASI Reports in 10 Points)

  1. हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने ने कहा कि रिपोर्ट से स्पष्ट है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में स्थित मस्जिद 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान एक भव्य हिंदू मंदिर को ध्वस्त किए जाने के बाद उसके अवशेषों पर बनाई गई थी।
  2. मस्जिद से पहले वहां बने मंदिर में बड़ा केंद्रीय कक्ष और उत्तर की ओर छोटा कक्ष था।
  3. सर्वेक्षण के दौरान दो तहखानों में हिंदू देवताओं की मूर्तियों के अवशेष पाए गए हैं।
  4. ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण में स्तंभों सहित पहले से मौजूद मंदिर के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल किया गया था।
  5. मंदिर को तोड़ने का आदेश और तारीख पत्थर पर फारसी भाषा में अंकित है।
  6. ज्ञानवापी परिसर में ‘महामुक्ति’ लिखा हुआ एक पत्थर भी मिला है।
  7. मस्जिद के पीछे की पश्चिमी दीवार एक मंदिर की दीवार है। दीवार पर घण्टा, वल्लरी (लताओं का उकेरा गया चित्र) और स्वास्तिक का चिह्न मिला है। दीवार पर पत्थरों पर उकेरा गया ब्रह्म कमल का तोरण द्वार बना हुआ है।
  8. Gyanvapi Masjid ASI Report: ज्ञानवापी परिसर में स्थित तहखाने की छत जिन खम्भों पर टिकी है वे सब नागर शैली के मंदिर के स्तंभ हैं
  9. सर्वे में 32 शिलापट और पत्‍थर मिले हैं, जो वहां पहले हिन्‍दू मंदिर होने के साक्ष्‍य हैं।
  10. शिलापटों पर देवनागरी, तेलुगु और कन्‍नड में आलेख लिखे हैं।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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