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बिहार में चुपचाप NRC लागू कर रहा चुनाव आयोग, ये एक मजाक है... वोटर लिस्ट विवाद में कूदे AIMIM प्रमुख ओवैसी

AIMIM chief Asaduddin Owaisi: असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव आयोग पर आगामी बिहाक चुनावों से पहले बिहार में गुप्त रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने का आरोप लगाया।

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ओवैसी ने चुनाव आयोग पर चुनाव से पहले बिहार में चुपचाप एनआरसी लागू करने का आरोप लगाया

Photo : ANI

Bihar Polls: बिहार चुनाव से पहले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव आयोग पर आगामी राज्य चुनावों से पहले बिहार में गुप्त रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने का आरोप लगाया। ओवैसी ने चेतावनी दी कि इससे कई वैध भारतीय नागरिक मतदान करने से वंचित हो सकते हैं और चुनाव से पहले चुनाव आयोग में जनता का विश्वास कम हो सकता है। उन्होंने कहा कि नए नियमों के तहत लोगों को अपने और अपने माता-पिता के जन्म विवरण को दस्तावेजों के माध्यम से साबित करने के लिए कहा गया है, जो कई गरीब नागरिकों, विशेषकर बाढ़ प्रभावित सीमांचल के लोगों के पास नहीं है।

एक्स पर एक पोस्ट में असदुद्दीन ओवैसी ने लिखा कि चुनाव आयोग पिछले दरवाजे से बिहार में एनआरसी कर रहा है। मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए अब हर नागरिक को न केवल यह साबित करने के लिए दस्तावेज दिखाने होंगे कि वे कब और कहां पैदा हुए, बल्कि यह भी बताना होगा कि उनके माता-पिता कब और कहां पैदा हुए। यहां तक कि सबसे अच्छे अनुमान भी यही बताते हैं कि केवल तीन-चौथाई जन्म ही पंजीकृत होते हैं। ज़्यादातर सरकारी दस्तावेज़ ग़लतियों से भरे हुए हैं। बाढ़ प्रभावित सीमांचल क्षेत्र के लोग सबसे ग़रीब हैं; वे मुश्किल से दो वक़्त का खाना जुटा पाते हैं। उनसे यह उम्मीद करना कि उनके पास उनके माता-पिता के दस्तावेज़ होंगे, एक क्रूर मज़ाक है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में ऐसी प्रक्रियाओं पर कड़े सवाल उठाए थे।

बड़ी संख्या में गरीबों का नाम मतदाता सूची से हट जाएगा: ओवैसी

पोस्ट में लिखा गया है कि इस प्रक्रिया का नतीजा यह होगा कि बिहार के बड़ी संख्या में गरीबों का नाम मतदाता सूची से हट जाएगा। मतदाता सूची में नाम दर्ज होना हर भारतीय का संवैधानिक अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में ही ऐसी मनमानी प्रक्रियाओं पर गंभीर चिंता जताई थी। चुनाव के इतने करीब ऐसी कार्रवाई शुरू करने से लोगों का चुनाव आयोग पर भरोसा कम होगा। उन्होंने कहा कि बिहार में मतदाता सूची में बने रहने के लिए लोगों को विस्तृत जन्म दस्तावेज दिखाने होंगे, जो उनके जन्म के समय पर निर्भर करेगा। पोस्ट में आगे लिखा है कि यदि आपका जन्म जुलाई 1987 से पहले हुआ है, तो आपको अपनी जन्म तिथि और/या जन्म स्थान दर्शाने वाले 11 स्वीकृत दस्तावेजों में से एक प्रस्तुत करना होगा। यदि आपका जन्म 01.07.1987 और 02.12.2004 के बीच हुआ है, तो आपको अपनी जन्म तिथि और जन्म स्थान दर्शाने वाला एक दस्तावेज प्रस्तुत करना होगा, साथ ही अपने माता-पिता में से किसी एक की जन्म तिथि और जन्म स्थान को प्रमाणित करने वाला एक दस्तावेज भी प्रस्तुत करना होगा। यदि आपका जन्म 02.12.2004 के बाद हुआ है, तो आपको अपने जन्म तिथि और जन्म स्थान के प्रमाण के साथ-साथ माता-पिता दोनों की जन्म तिथि और जन्म स्थान को प्रमाणित करने वाले दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे। यदि माता-पिता में से कोई भी भारतीय नागरिक नहीं है, तो आपके जन्म के समय उनके पासपोर्ट और वीज़ा की वैध प्रति भी प्रस्तुत करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ओवैसी ने दिया हवाला

ओवैसी ने कहा कि चुनाव आयोग की योजना एक महीने के भीतर बिहार में घर-घर जाकर मतदाताओं की जांच पूरी करने की है, लेकिन खराब कनेक्टिविटी और अधिक जनसंख्या वाले राज्य में यह अनुचित है। उन्होंने 1995 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मतदाताओं को बिना नोटिस और उचित प्रक्रिया के हटाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिकता का आकलन केवल कुछ दस्तावेजों के आधार पर नहीं किया जा सकता है, और सभी तरह के वैध सबूतों को स्वीकार किया जाना चाहिए। पोस्ट में लिखा गया कि भारत का चुनाव आयोग (ECI) एक महीने (जून-जुलाई) के भीतर हर मतदाता का घर-घर जाकर सत्यापन पूरा करना चाहता है। बिहार भारत में सबसे अधिक आबादी वाले और सबसे कम संपर्क वाले राज्यों में से एक है, इसलिए वहां इस तरह की प्रक्रिया को निष्पक्ष रूप से अंजाम देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। लाल बाबू हुसैन मामले (1995) में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि जो व्यक्ति पहले से ही मतदाता सूची में नामांकित है, उसे बिना नोटिस और उचित प्रक्रिया के हटाया नहीं जा सकता। यह साबित करना ईसीआई की जिम्मेदारी है कि किस आधार पर किसी व्यक्ति को विदेशी माना जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने माना कि नागरिकता केवल सीमित दस्तावेजों के माध्यम से साबित नहीं की जा सकती है, सभी प्रकार के प्रासंगिक साक्ष्यों पर विचार किया जाना चाहिए। बिहार में इस साल के अंत में अक्टूबर या नवंबर में चुनाव होने की उम्मीद है; हालांकि, भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) ने आधिकारिक तारीख की घोषणा नहीं की है।

Shashank Shekhar Mishra
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शशांक शेखर मिश्रा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल (www.timesnowhindi.com) में बतौर कॉपी एडिटर काम कर रहे हैं। इन्हें पत्रकारिता में करीब 5 वर्षों का अनुभव है। इन पांच सालों में देश की राजनीति से लेकर देश-दुनिया में बनते-बिगड़ते सत्ता समीकरणों एवं घटनाओं को कवर करने का अनुभव है। राजनीति, रक्षा और आटोमोबाइल्स की खबरों में विशेष रूचि के साथ खोजी पत्रकारिता और स्टिंग ऑपरेशन का भी अनुभव है। टाइम्स नाउ नवभारत में देश-दुनिया की खबरों के साथ रियल टाइम डेस्क पर कार्य करने का अनुभव है। शशांक ने इन 5 वर्षों के पत्रकारिता के कैरियर के दौरान टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में कार्य करने का अनुभव हासिल किया है। टाइम्स नाउ नवभारत में बतौर कॉपी एडिटर जुड़ने से पहले जागरण न्यू मीडिया, इनशार्ट्स, जी हिंदुस्तान और न्यूज हेल्पलाइन में सब एडिटर, रिपोर्टर और असिस्टेंट प्रोड्यूसर के तौर पर काम कर चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। इसके बाद एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन से पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन एंड टीवी जर्नलिज्म किया हैं। शशांक को जिम जाना, एडवेंचर एक्टिविटी करना और नई तकनीक को जानना और समझना बेहद पसंद है। इसके अलावा शशांक को ड्राइव करना और अध्यात्म में भी काफी रुचि हैं। शशांक शेखर मिश्रा उत्तर प्रदेश की राजधानी और नवाबों के शहर के रूप में फेमस लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं।

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