Monsoon Tracker: मानसून अब तक आधे से ज्यादा देश को कवर कर चुका है, लेकिन कुछ इलाकों को छोड़कर देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश औसत से कम हो रही है। कल यानी रविवार 28 जून तक ही देश में मानसूनी बारिश में 43 फीसद की कमी दर्ज की गई है। अगर आपको लग रहा है कि इस बार गर्मी कुछ ज्यादा लंबी और ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है, तो इसकी वजह सिर्फ मानसून की देरी नहीं है। दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ तापमान के बीच अब भारत के लिए भी एक नई चेतावनी सामने आई है। पहले जहां अल नीनो का असर देश के 111 जिलों तक सीमित माना जा रहा था, वहीं अब आशंका है कि 12 राज्यों के करीब 300 जिले इसकी चपेट में आ सकते हैं। इसका सबसे बड़ा असर खेती, पेयजल और ग्रामीण रोजगार पर पड़ सकता है।
दुनिया के कई देशों में इस समय प्रचंड गर्मी कहर बरपा रही है। यूरोपीय देश फ्रांस में गर्मी से एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि यूरोप के जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में सड़कें तक पिघलने लगी हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और राजस्थान सहित कई राज्यों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है, जिससे गर्मी और उमस लगातार बढ़ रही है।
नवंबर तक बना रह सकता है अल नीनो का असर
संयुक्त राष्ट्र की विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ट्रॉपिकल पैसिफिक महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो रहा है, जिससे अल नीनो की स्थिति बन रही है। रिपोर्ट में जून से अगस्त 2026 के दौरान अल नीनो की संभावना 80 फीसद तक बताई गई है, जबकि इसके नवंबर तक बने रहने की आशंका 90 फीसद या उससे भी ज्यादा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मध्यम से लेकर बेहद मजबूत स्तर तक पहुंच सकता है। यानी बारिश तो कम होगी ही, साथ ही प्रचंड गर्मी से दुनियाभर में लोगों का हाल बेहाल होगा।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इसे दुनिया के लिए गंभीर जलवायु चेतावनी बताया है। उनके मुताबिक, गर्म होती धरती पर अल नीनो आग में घी डालने जैसा साबित हो सकता है, जिसके असर देशों की सीमाओं से परे तेजी से फैलेंगे।

अल-नीनो के कारण बढ़ेंगी दुनियाभर की दिक्कतें
सरकार ने शुरू की तैयारी
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों को पहले ही सतर्क कर दिया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि जिन जिलों में अल नीनो का सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है, उनकी पहचान कर ली गई है। राज्यों को संवेदनशील इलाकों की सूची भेजी जा चुकी है, ताकि समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें।
सरकार ने संकेत दिए हैं कि अगर खेती या रोजगार पर असर पड़ता है तो प्रभावित लोगों को 'जी राम जी' कानून के तहत रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही तालाब, चेक डैम, खेत-तालाब, जलाशयों और नालों को दुरुस्त करने का अभियान भी शुरू किया जा रहा है, ताकि कम बारिश होने की स्थिति में ज्यादा से ज्यादा पानी का संरक्षण किया जा सके।
ICAR ने भी जताई चिंता
कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर 315 जिलों का आकलन किया है, जहां कम बारिश और सिंचाई की कमी का खतरा ज्यादा है। इनमें 111 ऐसे जिले हैं, जहां सिंचाई का दायरा 25 फीसद से भी कम है। ऐसे इलाकों में खरीफ फसलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है।
जून में 43 फीसद कम हुई बारिश
भारत मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिस, 1 से 27 जून के बीच देश में सामान्य से 43 फीसद कम बारिश हुई है। इस दौरान औसतन 141.8 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन इस बार सिर्फ 80.4 मिमी वर्षा हुई। सेंट्रल इंडिया में बारिश की कमी 57 फीसद, पूर्वोत्तर भारत में 44 पर्सेंट, दक्षिण भारत में 30 फीसदी और उत्तर-पश्चिम भारत में 27 प्रतिशत दर्ज की गई है।
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खेती से लेकर पीने के पानी तक चुनौती
कम बारिश का असर सिर्फ खेती तक ही सीमित नहीं रहेगा। सरकार ने संवेदनशील जिलों में पेयजल संकट से निपटने की तैयारी भी शुरू कर दी है। पुरानी जल संरचनाओं की मरम्मत, नई वॉटर बॉडी बनाने और जरूरत पड़ने पर पानी की आपूर्ति दूसरे क्षेत्रों से करने की योजना बनाई जा रही है।
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ताकि कमजोर मानसून का असर पशुधन पर न पड़े
इसके अलावा पशुपालकों के लिए भी राहत योजना तैयार की जा रही है। जिन राज्यों में चारे की पर्याप्त उपलब्धता है, वहां से कमी वाले इलाकों में पहले से ही सप्लाई की व्यवस्था करने की तैयारी चल रही है, ताकि कमजोर मानसून की स्थिति में पशुधन पर संकट न आए।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अगले कुछ सप्ताह मानसून और कृषि, दोनों के लिहाज से बहुत ज्यादा अहम रहने वाले हैं। अगर जुलाई में भी बारिश सामान्य से कम रहती है तो इसका असर देश की खाद्य उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महंगाई पर भी देखने को मिल सकता है।
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